हल्द्वानी के अनिल ने गढ़ी ऑर्गेनिक खेती की नई परिभाषा, जुनून ने दिलाया सम्मान

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हल्द्वानी: राज्य के पहाड़ी इलाके खेती पर निर्भर हैं। वक्त बदलने के साथ किसान भी बदला है और उसने भी स्मार्ट राह को अपनाया है। पिछले कुछ वक्त से खेती से युवा जुड़ रहे हैं और राज्य में स्टार्टअप खोल रहे हैं। ऐसे कई किसान हैं जिन्होंने अपने काम से पूरे राज्य में ही नहीं बल्कि देश में भी पहचान बनाई है। अपनी आय के अलावा वो दूसरे किसानों की आय के लिए स्त्रोत भी बनें हैं।। हम बात कर रहे हैं नैनीताल जिले की हल्द्वानी ब्लॉक की ग्रामसभा फत्ताबंगर के गांव हिम्मतपुर मोटाहल्दू के रहने वाले अनिल पांडे की, जिन्हें जैविक खेती के क्षेत्र पर शानदार काम करने के लिए मुख्यमंत्री भी सम्मानित कर चुके हैं।

अनिल के लिए खेती का काम नया नहीं था। उनका परिवार दशकों से खेती से जुड़ा था। खेती के बारे में उन्हें बचपन से ज्ञान मिलना शुरू हो गया था। इस बारे में अनिल कहते हैं कि खेती को लेकर उत्साहित रहता था। उम्र के साथ यह जुनून बढ़ता चला गया। इसी सोच को पूरे क्षेत्र में फैलाने के लिए मैं गांव-गांव घर-घर घूमा। पिताजी पशुपालन विभाग में कार्यरत थे तो पशु उपचार और कृत्रिम गर्भाधान भी उन्होंने सिखा। साल 2002 से दूध के व्यापार से जुड़ने का प्लान उन्होंने बनाया। इसके अलावा किसानों की आय को कैसे बढ़ाया जाए इस मिशन पर वह काम करने लगे। सबसे पहले गोबर व गोमूत्र का इस्तेमाल नए तरीके से कैसे किया जाए इस बारे में उन्होंने जाना। इसके चलते अनिल का मेरा रूझान जैविक खेती की ओर बढ़ा।

लिहाजा अनिल ने सबसे पहले अपने आस-पास के किसानों को इस जैविक खेती का महत्व समझाया और फिर उनको एक समूह का रूप दिया। जैविक खेती की इतनी गूढ़ जानकारी ने अनिल को भी आगे बढ़ने का मौका दे दिया। कृषि विभाग के अधिकारियों को जब अनिल के इस जुनून के बारे में पता चला तो उन्हें साल 2005 में बतौर जैविक प्रशिक्षक (मास्टर ट्रेनर) के तौर पर हल्द्वानी में अल्प मानदेय पर रखा। इसके तहत अनिल ने खेती के हर पहलू को किसानों को सिखाने की जिम्मेदारी थी। अनिल किसानों को हरी खाद, जैव उर्वरक, वर्मी कम्पोस्ट, नाडेप कम्पोस्ट, नीम ऑयल, गोमूत्र (तरल खाद), ट्राइकोडर्मा, सुडोमनास, एजोला, विवेरिया बेसियाना आदि का प्रयोग करना सिखाते थे। अनिल की ख्वाहिश थी कि वो पूरे विकासखंड को जैविक ब्लॉक बनाएं लिहाज़ा उनका रुझान जैविक खेती की तरफ लगातार बढ़ता चला गया और अनिल बुलंदियों के सफर पर निकल गए।

अनिल के लिए जैविक खेती सब कुछ बन चुकी थी और वो इसी जैविक खेती का मास्टर बनना चाहते थे। उनकी कोशिश थी कि वह जो भी करें उसके बारे में अन्यों को भी बताए। इसके लिए अनिल ने पूरा ज़ोर लगाया और प्रशिक्षण के लिए जैविक कृषि प्रशिक्षण केन्द्र मजखाली (रानीखेत) में जाना शुरू कर दिया। साल 2013 में उत्तराखण्ड ओपन युनिवर्सिटी से जैविक कृषि पर डिप्लोमा हासिल किया। अनिल ने विकासखण्ड के लगभग 2000 किसानों को जैविक कृषि का प्रशिक्षण दिया। उनके घरों पर वर्मी कम्पोस्ट, नाडेप, वर्मी कल्चर सेन्टर, तरल खाद की पक्की संरचनाओं का निर्माण करवाया। विभागीय कार्यों में सहयोग करते हुए मिट्टी की जांच, विभिन्न कृषि मेलों का आयोजन और विकास खंड के किसानों का जैविक खेती में रजिस्ट्रेशन भी करवाया। वह विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाओं से जुड़े।

अनिल पांडे की इसी कोशिश ने उन्हें रातोंरात जैविक यानी ऑर्गेनिक किसान की उपाधि दिला दी। उत्तराखण्ड़ के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत सहित कई अन्य लोगों  ने अनिल के जज्बें को सलाम किया है। प्रदेश में जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे अनिल पांडे कई सम्मान भी प्राप्त कर चुके हैं।

अनिल पांडे जैविक खेती के लिए किसानों के अलावा आम लोगों तक भी अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। अनिल का अगला मिशन अब जैविक गार्डन है जिसके लिए वो आम लोगों को प्रेरित करने में जुटे हैं। इसके लिए इच्छुक लोगों को घर में पड़े अपशिष्ट पदार्थ, जैसे- सब्जी व फल के छिलके के द्वारा कम्पोस्ट खाद बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

जैविक खेती को बढ़ावा देने हेतु अनिल ने “जैविक पाठशाला”का निर्माण करवाया जहां पर जैविक की विभिन्न ट्रेनिंग प्रोग्राम, मिट्टी की जांच, व पंचगव्य, पंचामृत, जीवामृत आदि खादों को बनाने की बृहद ट्रेनिंग क्षेत्र व जिले के किसानों को दी जा रही है।अनिल पांडे अपनी जैविक खेती की कला के चलते काफी बड़ा नाम कर रहे हैं। वह अपने यहां आने वाले अतिथियों का सम्मान उन्हें जैविक बुके देकर करते हैं।

जैविक खेती से हैं लाभ इसलिए कर रहे किसानों को जागरूक

उत्तराखण्ड़ के करीब सात हजार किसानों को जैविक खेती की ट्रेनिंग देने वाले जैविक ट्रेनर अनिल पांडे जैविक खेती के लाभ गिनाते हुए बताते हैं, “जैविक कृषि वह पद्धति है, जहां प्रकृति व पर्यावरण को स्वच्छ व संतुलित रखते हुए भूमि की सजीवता, जल की गुणवत्ता, जैसे विविधता आदि को बनाये रखते हुए वह पर्यावरण एवं वायु को प्रदूषित किए बिना, दीर्घकालीन व टिकाऊ उत्पादन प्राप्त किया जाता है। जैविक कृषि वह पद्धति है, जहां प्रकृति व पर्यावरण को स्वच्छ व संतुलित रखते हुए भूमि की सजीवता, जल की गुणवत्ता, जैसे विविधता आदि को बनाये रखते हुए वह पर्यावरण एवं वायु को प्रदूषित किए बिना, दीर्घकालीन व टिकाऊ उत्पादन प्राप्त किया जाता है।”

पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक कृषि

पर्वतीय इलाकों में जैविक कृषि के बारे में अनिल पांडे बताते हैं, “विशिष्ठ भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि की एक विशेष परम्परा रही है। हमारी जोतें मैदानी क्षेत्रों के मुकाबले बहुत ही सीमित होती हैं जिस कारण यहां की मृदा में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते हैं जिस कारण पर्वतीय कृषि उत्पाद की गुणवत्ता यहां की सर्वोत्तम और प्रमुख विशेषता है। इसके साथ ही पर्वतीय उत्पाद को जैविक उत्पाद के परिप्रेक्ष्य में इसलिए भी विशिष्ट माना जायेगा क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की तरह यहाँ रसायनों का प्रभाव बहुत ही न्यून रहा है। यदि कुछ गिने-चुने क्षेत्रों को छोड़ दिया जाये तो यहां रसायनों का प्रयोग बहुत ही नहीं है। कृषि उत्पादन सीमित है, भूमि सीमित है, जिस कारण पर्वतीय युवा का कृषि क्षेत्र में पहले की तरह रूझान नहीं रहा है और यही पर्वतीय क्षेत्रों में यवुा वर्ग के पलायन का सबसे प्रमुख कारण है।”

वाकई अनिल पांडे ने जैविक खेती की नई परिभाषा गढ़ी है। यकीनन अगर हर ब्लॉक में एक किसान भी अगर अनिल के जुनून को अपना कर आगे बढ़ता रहेगा तो उत्तराखंड भी सिक्किम की तरह पूर्ण ऑर्गेनिक राज्य में बदल सकता है। और इसके लिए अनिल जैसे कई ऑर्गेनिक किसानों को आगे आना होगा। साथ ही आम लोगों को भी इस जैविक खेती के महत्व को समझकर उसे आत्मसात करना होगा। अनिल के इस जुनून को हमारा सलाम।


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