सिर्फ गांव के बच्चों को पढ़ाने के लिए आशीष हर हफ्ते तय करते हैं 700 किलोमीटर का सफर!

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अगर सवाल ये किया जाए कि दुनिया में सबसे सम्मानीय पेशा कौन सा है तो जवाब अध्यापन ही मिलेगा क्योंकि यही एक ऐसी विधा है जिसमें सम्मान ही सम्मान है। ये सम्मान तब और बढ़ जाता है जब गरीब और वंचितों को शिक्षा देने के लिए आप जी-जान एक कर दें। इससे ज्यादा पुण्य का काम शायद ही कोई दूसरा हो। इसी तरह का सम्मानीय काम एक उत्तराखंड का सपूत कर रहा है। हर सप्ताह ये युवा गुड़गांव से 20 घंटे का सफर कर उत्तराखंड में अपने गांव जाता है सिर्फ वहां बच्चों को पढ़ाने.. 

आशीष डबराल गुड़गांव में एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में नौकरी करते हैं। शानदार कमाई है, लेकिन फिर भी एक कसक उनके दिल में हमेशा से रही यही वजह भी थी कि आशीष डबराल बिना किसी स्वार्थ के हर सप्ताह अपने गांव जाते हैं सिर्फ बच्चों को पढ़ाने। उनका गांव उत्तराखंड में तिमली पौड़ी-गढ़वाल जिले में स्थित है।

सवाल उठता है कि आखिर क्यों आशीष हर हफ्ते 20 घंटे का सफर कर सिर्फ बच्चों को पढ़ाने के लिए अपने गांव जाते हैं? असल में आशीष अपनी विरासत को आगे बढ़ाने का जतन कर रहे हैं। उनके परदादा ने गांव में ही 1882 में संस्कृत स्कूल की स्थापना की थी उनका भी मकसद यही था कि गांव में कोई अशिक्षित ना रह जाए। आशीष ने उन्हीं से प्रेरणा लेकर उनकी सोच को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। उनके दादा बद्री दत्त डबराल ने श्री तिमली संस्कृत पाठशाला की स्थापना की थी। वैसे रिपोर्ट्स तो ये कहती हैं कि ये इलाका उस वक्त संयुक्त प्रांत में आता था। संस्कृत शिक्षा की वजह से ही इसे गढ़वाल का काशी भी कहा जाता था। बाद में 1969 में सरकार द्वारा इसे अधिग्रहीत कर लिया गया। 

आशीष बताते हैं कि 2013 में यह स्कूल बुरी स्थिति में पहुंच गया, क्योंकि इलाके में पलायन और गरीबी की वजह से कोई पढ़ने वाला ही नहीं बचा। सिर्फ 3 बच्चों ने उस वर्ष अपना दाखिला कराया था। आशीष ने अपनी परदादा की संस्कृति को खोने के डर से अपने गांव के पास में ही अपने परिजनों की सहायता से एक कंप्यूटर सेंटर भी खोल दिया। ताकि शिक्षा के नाम पर बच्चों का रुझान इस स्कूल की तरफ बड़े। आशीष के द्वारा खोले गए इस सेंटर में तिमली और आसपास के इलाकों के बच्चे कंप्यूटर सीखने आते हैं। वे कहते हैं, ‘इस गांव में पले-बढ़े होने के कारण यहां से एक लगाव बना हुआ है। हमारा मकसद है कि यहां के बच्चों को शिक्षित किया जाए और उनके रोजगार की व्यवस्था की जाए ताकि पलायन रुक सके।’ उत्तराखंड के गांवों का पलायन होने की वजह से कई गांवों को भूतों का गांव कहा जाने लगा है क्योंकि वे पूरी तरह से सुनसान हो गए हैं। 

आशीष ने इस सेंटर को शुरू करने के लिए कई नौकरिया बदलीं और पैसे जुटाए। इसके बाद अपनी पत्नी और भाई की मदद से कंप्यूटर सेंटर शुरू किया। 2013 में वे गुड़गांव में शिफ्ट हुए थे और 2014 से कंप्यूटर सेंटर की शुरुआत हुई। इस सेंटर का नाम ‘द यूनिवर्सल गुरुकुल’ है। बीते 5 साल से आशीष हर सप्ताह गुड़गांव से तिमली जाते हैं और कंप्यूटर सेंटर के साथ ही पास के प्राइमरी स्कूल के बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं। ताज्जुब की बात तो ये है कि आशीष के गांव से लगभग 80 किलोमीटर के दायरे में कोई स्कूल नहीं है। लिहाज़ा आशीष की ये दौड़-धूप रंग लाने लगी। लगभग 23 गांव के 36 बच्चों से अब आशीष का ये स्कूल गुलज़ार हैं। बच्चों में भी इस स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने का काफी क्रेज़ है। वो भी हर रोज 4 से 5 किलोमीटर का सफर करके स्कूल पहुंचते हैं। आशीष का दिल्ली से उत्तराखंड का सफर करना काफी थका देने वाला होता है, लेकिन फिर भी वे इसे किये जा रहे हैं। वे कहते हैं, ‘मैं काफी दिनों से ये काम कर रहा हूं और अब ये काम ही मेरी जिंदगी बन गया है। मैं गुरुवार की रात ISBT से बस पकड़ता हूं और ऋषिकेश पहुंचता हूं। यहां मेरा परिवार रहता है। सुबह का नाश्ता करने के बाद मैं अपनी खुद की गाड़ी से देवीखेत पहुंचता हूं जो कि ऋषिकेश से तकरीबन 90 किलोमीटर पड़ता है। रविवार को मैं वापस गुड़गांव आ जाता हूं।’ आशीष अपने प्राइमरी स्कूल को आगे तक बढ़ाना चाहते हैं। बच्चे भी आशीष के हर हफ्ते आने का इंतज़ार करते हैं और जब आशीष को जाना पडता है तो बच्चों की मायूसी आशीष का भी दिल पिघलाने में देर नहीं लगाती। वाकई आशीष की इसी मेहनत ने उस गांव के बच्चों में शिक्षा का बीज बोया है जो आगे जाकर सफलता का फूल बनकर समाज को महकाएगा। ये खुशबू आशीष को अभी से आने लगी है। वाकई आशीष की इस मेहनत और सोच को हमारा सलाम।


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