बंजर जमीन पर दिखा चाचा-भतीजे की सोच का कमाल, पैदा कर दी लाखों की हल्दी-अदरक

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पलायन की मार झेल रहे गांवों में ही पलायन की समस्या को रोकने के निदान मौजूद होते हैं लेकिन फिर भी युवा उनसे सीख ना लेकर अलग धुन पर सवार होकर गांव से निकल ही जाते हैं। कपकोट के जारती गांव जिसे सैनिक बहुल गांव के नाम से भी जाना जाता है वहां के दो नौजवानों ने कुछ ऐसा कर दिखाया है जिसने गांव में ही उम्मीद की नई किरण जगाई है।ये चाचा-भतीजे की जोड़ी है जो हाइली एजुकेटेड हैं यानी अच्छी खासी पढ़ाई की है, चाहते तो अच्छी नौकरियां भी आसानी से मिल जाती। लेकिन दोनों ने गांव में ही रहकर कुछ अलग करने की सोची। भूपेंद्र सिंह मेहता और जितेंद्र मेहता ने हल्दी की खेती से ही डेढ़ साल में दो लाख रुपये कमाकर जहां अपनी आर्थिकी सुधारी, वहीं वो दूसरे युवाओं के लिए प्रेरक भी बन गए।

कैसे आई गांव में खेती कर कमाने की सोच?

कपकोट के दूरस्थ क्षेत्र में स्थित जारती गांव में 80 प्रतिशत लोग सेना में हैं। यानी नौकरी के कारण गांव से बड़ी संख्या में पलायन हुआ और परिवार के परिवार वहां से गांव खाली करके चले गए। हालत ये हो गई कि करीब 900 की आबादी की संख्या महज़ 400 तक सिमट कर रह गई । और तो और जंगली सुअरों और बंदरों के आतंक ने गांव वालों को खेती के अलग होने के सिवा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं छोड़ा। लेकिन इन दोनों की जोड़ी ने गांव में एक नई अलख जलाई वो भी खेती की। दोनों अपनी पैतृक जमीन की दशा देखकर मायूस थे दोनों ने काफी विचार-विमर्श के बाद बंजर पड़ी भूमि में खेती करने का निर्णय लिया। ताकि जमीन से आजीविका के अवसर तलाशे जा सकें और ऐसी फसल उगायी जाए, जो कम लागत में तैयार हो और जंगली जानवरों से भी महफूज रहे।लिहाज़ा सिंचाई के अभाव में अपने 10 साल से बंजर पड़े खेतों में इन दोनों चाचा-भतीजों ने हल्दी और अदरक की बुआई की। दोनों चाचा-भतीजों ने उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद रोजगार के लिए महानगरों का रुख करने की बजाय गांव में ही 2016 में खेती की शुरुआत की। उन्होंने सबसे पहले धान की खेती की, इसमें उन्हें मुनाफा अपेक्षाकृत कम हुआ। वर्ष 2017 में दोनों चाचा-भतीजों ने मार्गदर्शन के लिए उद्यान विभाग के सहायक विकास अधिकारी नंदन सिंह गडि़या से मुलाकात की और जानकारी ली। उन्होंने वर्तमान में अपनी करीब एक हेक्टेयर भूमि में 7 कुंतल हल्दी की सुवर्णा, पंत पीताभ और 3 कुंतल रियो डी जनेरियो किस्म के अदरक की बुआई की है। दोनों युवाओं का हौसला देख आसपास के ग्रामीण भी हैरान हैं। पिछले डेढ़ साल में इन्होंने हल्दी की खेती से ही दो लाख रुपये की कमाई कर डाली।

उच्च शिक्षित हैं चाचा-भतीजा

भूपेंद्र सिंह मेहता गणित में M.Sc पास आउट हैं। वो बेड़ा मझेड़ा में एक निजी स्कूल में प्रधानाचार्य हैं और उनका भतीजे जितेंद्र मेहता ने एनिमेशन से बीएससी की पढ़ाई की है। जितेंद्र भी हल्द्वानी में नौकरी करते हैं। नौकरी के साथ साथ ही ये दोनों कुछ समय हल्दी की खेती के लिए देते हैं। इस काम में भूपेंद्र सिंह मेहता की पत्नी भगवती मेहता (एमए इतिहास) और बहन मोहनी देवी खेतीबाड़ी में मदद करतीं हैं।

10 हजार के बीज से 2 लाख की हल्दी

भूपेंद्र बताते हैं कि 18 महीने पहले उन्होंने 30 नाली भूमि में दस हजार रुपये से पंथ पीताभ, स्वर्णा प्रजाति की 7 क्विंटल हल्दी लगाई थी। इससे करीब 40 क्विंटल हल्दी का उत्पादन हुआ है, जिसका बाजार मूल्य करीब दो लाख रुपये है। बताया कि अदरक से भी अच्छी आमदनी हो रही है। उन्होंने सहयोग के लिए उद्यान विभाग कपकोट का आभार जताया। कहा कि विभाग ने समय समय पर प्रशिक्षण और बीज उपलब्ध कराया।

मार्केटिंग में चाहिए सरकार का साथ

मार्केटिंग (विपणन) की सुविधा न होने से निराश भूपेंद्र और जितेंद्र कहते हैं कि वे कपकोट या बागेश्वर में हल्दी बेचते हैं। इस समय कच्ची हल्दी 45 रुपये किलो और सूखी करीब 80 रुपये किलो बिक रही है। उनका कहना कि यदि सरकार बाजार उपलब्ध करा दें तो आय कई गुना बढ़ सकती है।हालांकि कई कंपनियां ऑनलाइन उनसे हल्दी के उत्पाद के लिए सम्पर्क कर रही हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकार विपणन पर प्रसंस्करण की व्यवस्था पहाड़ों में उपलब्ध कराए, तो पहाड़ में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रयास पलायन रोकने में कारगर होगा। उन्होंने कहा कि पहाड़ के युवाओं में गजब का जोश और जज्बा जरूरत है, तो सिर्फ उनकी प्रतिभा को पहचानने की।

भूपेंद्र और जितेंद्र ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी खेती कर उन लोगों को आइना दिखाया है, जो अपनी पुश्तैनी जमीन को छोड़कर रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं। ऐसे शिक्षित लोगों में अगर अपने गांव के प्रति सजगता आएगी तो ना सिर्फ गांव में रोज़गार के अवसर पनपेंगे बल्कि गांव से पलायन भी काफी हद तक रुक जाएगा।


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