पहाड़ के किसान का कमाल, बिना मिट्टी-खाद के सब्ज़ियों और हर्ब्स की खेती से लाखों की इनकम

180
Share Now

खुद पर भरोसा हो तो इंसान क्या कुछ नहीं कर सकता। उत्तराखंड में एक ऐसे ही युवक ने खेती में वो कारनामा कर दिखाया है जो लाखों किसानों को प्रेरित कर सकता है। उत्तराखंड के पौड़ी जिले के गणेश सिंह बिष्ट आज किसानी में जाना पहचाना नाम बन गए हैं। गणेश बिष्ट ने कुछ नया करने की चाह में ऐसा कुछ कर दिया जिसने लोगों को घर बैठे कम खर्चे पर कमाने का साधन दे दिया। गणेश बिना मिट्टी-खाद और कम लागत में शानदार खेती कर रहे हैं और बहुत ही कम जगह में सब्जियों से लेकर मेडिकल हर्ब्स तक उगाकर एक मिसाल पेश कर रहे हैं।

हादसे ने बदल दी किस्मत

उत्तराखंड में हर युवा की यही ख्वाहिश होती है कि वो रोज़गार के लिए मैदानी इलाकों का रुख करे ताकि उसकी इनकम अच्छी हो सके। मजबूरन कई लोगों को छोटी बड़ी नौकरी कर अपना गुजारा करना होता है। यही कहानी पौड़ी के एक युवा गणेश बिष्ट की भी थी। साल 2000 से गणेश दिल्ली में जॉब कर रहे थे। कमाई ज़रूर अच्छी थी लेकिन कुछ नया करने की चाह उनको वापस पहाड़ बुला रही थी। आखिरकार साल 2014 में गणेश ने अपने मन की करने की ठान ली और जॉब छोड़कर वो वापस अपने गांव उत्तराखंड आ गए।

उत्तराखंड आकर गणेश ने बिजनेस शुरू करने का प्लान बनाया ही था कि सड़क दुर्घटना ने उनका मनोबल पूरी तरह तोड़ दिया । एक साल तक बिस्तर पर रहने के बाद गणेश ठीक तो हो गए लेकिन शरीर में ताकत वैसी नहीं थी। इसके बाद गणेश ने घर पर ही कुछ बिजनेस करने का इरादा बना लिया। गणेश ने खेती में अपने हाथ आज़माने शुरु कर दिए वो भी आधुनिक तरीके से।

इज़राइल की तकनीक को पहाड़ में ले आए गणेश

गणेश को फील्ड वर्क के दौरान हासिल हुआ अनुभव काम आया।काम के दौरान गणेश ने करनाल में हाइड्रोपोनिक्स यानि जल संवर्धन और ड्रिप इरिगेशन के जरिये की जाने वाली कृषि की जानकारी हासिल की थी।ये तकनीक उनको काफी भाई थी जिसके बाद उन्होंने वहां कुछ समय तक इसको सीखा भी था। खेती की ये टेक्नीक मुख्य रूप से इजराइल में इस्तेमाल की जाती है। क्योंकि अरब देशों में पानी की काफी कमी है जिसके चलते ये जल संवर्धन की इसी तकनीक का इस्तेमाल कर वहां पर खेती की जाती है। रेतीली भूमि होने की वजह से ना तो वहां मिट्टी मिलती है और ना ही खाद का कोई उपयोग रह जाता है। लिहाज़ा इस तकनीकी में बिना मिट्टी के सिर्फ पानी की मदद से कृषि की जाती है। जिसे हाइड्रोपोनिक्स कहा जाता है। इसके जरिये पैदा होने वाले उत्पाद पारंपरिक खेती से होने वाले उत्पादों की अपेक्षा जल्दी उगते हैं। जिसमे श्रम और लागत दोनों ही बेहद कम होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार इजराइल की इस कृषि तकनीकी का जिक्र कर चुके हैं।

लोगों की हंसी ने दिया हौसला

गणेश ने देहरादून के पास ही भानियावाला में छोटी सी जगह पर हाइड्रोपोनिक्स तकनीकी प्लांट को लगाया। जहाँ उन्होंने सब्जी के साथ कई अन्य आयुर्वेदिक पौधे उगाने शुरू किए। शुरुआती दिनों में जब गणेश लोगों को बिना पानी की खेती के बारे में बताते थे तो लोग उनपर हंसा करते थे। कहते थे कि बिना मिट्टी के सब्जी उगाने वाले ये पहले किसान होंगे। लेकिन गणेश का हौसला इससे टूटा नहीं बल्कि लोगों की हंसी ने उनको और भी ताकत दे दी। जब गणेश अपने मिशन में कामयाब हो गए तो लोगों की हैरानी की हद नहीं थी।

हाइड्रोपोनिक्स खेती बन गया बिज़नेस मॉडल

गणेश का ये मिशन धीरे धीरे सुर्खियां हासिल करने लगा।ये तकनीक आसपास के किसानों को प्रेरित करने लगी। लोग दूर दूर से गणेश के पास आकर उनकी इस तकनीकी को देखने और उसके बारे में जानने के लिए आने लगे। जिसके बाद गणेश ने हाइड्रोपोनिक्स तकनीकी से कृषि सीखने वाले लोगों को प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने शुरू कर दिए। बाद में गणेश ने खेती के इस तकनीकी को बिजनेस मॉडल के रूप में ढालने का मन बनाया और सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में यह तकनीकी संयंत्र किफायती मूल्य में स्थापित करने लगे और उनका प्रशिक्षण देना शुरू किया।

कम लागत में लाखों की इनकम

गणेश सब्जियां उगाते हैं, हर्ब्स उगाते हैं जिसकी मार्केट में पूरी तरह खपत हो जाती है। मेडिसिलन हर्ब्स के दाम भी शानदार मिलते हैं, प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाते हैं और साथ ही वो इस तकनीक को सिखाते भी हैं यानी गणेश अपनी कमाई लाखों तक ले जा चुके हैं। यही नहीं गणेश इन सबके अलावा पशुओं के लिए हरा चारा भी तैयार करते हैं। यानी कम लागत, कम मेहनत, बिना मिट्टी, बिना खाद और कम पानी में खेती का ये मॉडल उत्तराखंड में किसानों की किस्मत बदल सकता है। यही नहीं, ये तकनीक बड़े शहर के उन निवासियों के लिए भी बहुत फायदेमंद है जो घर में खुद सब्जी उगाकर खाना चाहते हैं। गणेश कहते हैं कि खेती की ये उन्नत तकनीक भविष्य में सबसे ज्यादा प्रयोग में लायी जाने वाली तकनीक बन सकती है क्योंकि आने वाले वक्त में खेती लायक इतनी जमीन होगी नहीं, जिसके बाद लोगों को मजबूरन ही सही इसी तकनीक का सहारा लेना ही पड़ेगा।


Share Now