सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने नौकरी छोड़ शुरू किया डेयरी उद्योग, Start-Up ने चमका दी किस्मत

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बैंगलोर की एक बड़ी IT कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करने वाले उत्तराखंड के हरिओम नौटियाल ने लाखों की नौकरी छोड़कर गांव लौटना ही बेहतर समझा और अपने गांव में ही शुरु किया डेयरी और फार्मिंग उद्योग जिससे आर्थिक रूप से कमज़ोर महिलाओं को वो अब आत्मनिर्भर बना रहे हैं। उनके सफल Start-Up की ये कहानी आपको भी प्रेरित ज़रूर करेगी।

हरिओम नौटियाल बैंगलोर की आईटी कंपनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हुआ करते थे। मोटी सैलरी भी पाते थे लेकिन मन में उनके हमेशा गांव ही बसा रहा। लेकिन हरिओम ने अपनी दिमाग की ना सुनकर दिल की सुनी और नौकरी छोड़कर अपने गांव लौट आए। यहां लौटकर हरिओम ने खुद के फार्म हाउस से उत्पादित दूध, अंडे और चिकन की दूर-दूर तक सप्लाई करने का काम शुरू किया और आज की तारीख में हरिओम हर महीने में 4 से 5 लाख रुपये के आसपास लाभांश कमा रहे हैं।

हरिओम ने ‘धन्‍यधेनु’ नाम से अपना बिज़नेस खड़ा किया। ये बिज़नेस मॉडल बाकी बिज़नेस से ज़रा हटकर है। हरिओम ने गांव में हर उस काम को अपनाया जिससे आम आदमी जुड़ा हुआ है। मसलन हरिओम ने अपने बिज़नेस में डेयरी का काम, बकरी पालन और कुक्कुटशाला के साथ मशरूम की खेती भी करनी शुरू की। जिसके नतीजे उन्हें तेजी से मिलने भी लगे। उनके बिज़नेस की खास बात ये है कि वो अपने उद्योग के माध्यम से गांव की उन महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहे हैं जिनके पास कमाई के साधन मौजूद नहीं थे।

हरिओम ने अपने बिज़नेस को शुरू करने के लिए अपनी सारी जमापूंजी झोंक दी साथ ही माता-पिता का भी आर्थिक सहयोग लिया और ‘धन्यधेनु’ की शुरुआत की। इस काम को शुरू करने के पीछे हरिओम का मकसद सिर्फ एक था, वो अपने गांव की गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। यही वजह थी कि उन्होंने अपने करियर की परवाह किए बिना ही नौकरी छोड़कर गांव में आने का फैसला लिया और फिर गांव के लोगों को रोज़गार के अवसर मुहैया करवाए।

हरिओम रानीपोखरी, देहरादून के ग्राम बड़कोट के रहने वाले हैं। माता-पिता की भी चाह ये नहीं थी कि बेटा उनकी आंखों से दूर रहे। हरिओम ने भी वही किया और अपने हुनर से कुछ ऐसा कर दिखाया कि आज घर बैठे वो लाखों रुपए का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। हरिओम का डिजाइन किया गया बिज़नेस मॉडल भी अनोखा है। हरओम ने घर पर ही दो मंजिला फार्म बना डाला और पिछले चार-पांच साल से ‘धन्‍यधेनु’ नाम से एक दर्जन से अधिक सायवाल, हरियाणवी, जर्सी, रेड सिंधी नस्लों की गाय-भैंसें पाल रहे हैं। यही नहीं देसी मुर्गी पालन और मशरूम का भी उत्पादन उनके फॉर्म पर ज़ोरो शोरों से हो रहा है। हरिओम के यहां उत्पादित दूध, अंडे और चिकन की दूर-दूर तक सप्लाई हो रही है।

हरिओम का मानना है कि ”बिज़नेस की नज़र से जर्सी गायों की अपेक्षा देसी गायें पालना ज्यादा मुनाफेदार सौदा है। एक तो जर्सी के मुकाबले देसी गायें कम समय में दूध देने के लिए तैयार हो जाती हैं। इसके गोबर से अगरबत्ती, वर्मी कंपोस्ट और बायोगैस भी तैयार हो जाती है। इसका गोबर जीवाणु निरोधक भी होता है। पिछले कुछ समय से इसका मूत्र भी अच्छे दाम पर बिकने लगा है। इतने तरह के फायदे विदेशी नस्ल की गायों से संभव नहीं है।”

हरिओम का बिज़नेस डेयरी से शुरू होकर आज पॉल्‍ट्री, कंपोस्टिंग और जैम-अचार-शर्बत बनाने की फैक्‍ट्री तक पहुंच गया है। जब उन्‍होंने डेयरी काम शुरु किया था, रोजाना सिर्फ नौ रुपए की बचत होती थी। परिवार और नाते-रिश्ते के लोग भी शुरु में घबराने लगे कि आखिर बेटे ने नौकरी छोड़कर कहीं गलत कदम तो नहीं उठा लिया। ऐसा महीनों तक चलता रहा लेकिन हरिओम के अंदर हिम्मत भरी थी और इरादे चट्टान की तरह अडिग रहे। लिहाज़ा उन्होंने कुक्कुटशाला भी खोल ली। बकरी पालन के साथ मशरूम की खेती भी करने लगे। इसके बाद स्थितियों ने तेजी से करवट ली। आज उनका काम-काज तेजी से चल निकला है। आज की तारीख में उनके व्यवसाय से लगभग 40-50 के बीच महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो उनके काम को काफी अच्छे से कर रही हैं।

हरिओम चाहते हैं कि कम से कम एक हजार लोग उनके सहयोग से अपनी रोजी-रोटी अपने बल पर कमाएं। अपने घर-गांव में रहते हुए बिजनेस करने के इच्छुक क्षेत्रीय युवाओं को वह ट्रेनिंग भी दे रहे हैं। साथ ही मिनी स्टोर्स के जरिये अपने बिजनेस का उत्तराखंड में विस्तार करने में जुटे हुए हैं। हिरओम भविष्य में भारत के अधिकतर शहरों में मिनी स्टोर खोलना चाहते हैं। हरिओम चाहते हैं कि उनके गांव का ये काम सिर्फ उत्तराखंड तक ही सीमित ना रहे बल्कि पूरे भारत में इनके उत्पादों की डिमांड बढ़े। और वो अपने इस मिशन की तरफ तेज़ी से बढ़ भी रहे हैं। यकीनन हरिओम ने जिस जुनून से अपनी हाथों की लकीरों को खुद गढ़ा है वो ज़रूर एक दिन अपने मिशन में कामयाब ज़रूर होंगे।


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