विदेश की लाखों की नौकरी छोड़, हल्द्वानी के हिमांशु ने शुरू किया ये शानदार काम

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उत्तराखंड में प्रेरणादायक कहानियां भी कम नहीं। आज का युवा अपने पहाड़ के बारे में सोचने लगा है। तभी तो विदेशों में लाखों के सालाना पैकेज को ठुकराकर लोग पहाड़ में आकर अपना काम कर रहें हैं। ना सिर्फ काम बल्कि लोगों को भी रोज़गार मुहैय्या करवा रहे हैं। राज्य सरकार भी रिवर्स माइग्रेशन पर काम कर रही है। सरकार की नीतियों से अलग तमाम दूसरे युवा देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक कमाल कर रहे हैं वो भी पहाड़ पर रह कर ही। वो दूसरे युवा लोगों के लिए भी रोल मॉडल बनकर उभरे हैं। अपने घर लौटकर हिमांशु जोशी ने जो किया उसने वाकई कमाल कर दिया।

हिमांशु मूल रूप से अल्मोड़ा जिले के खेरदा के रहने वाले हैं जो कि अब हल्द्वानी में रहते हैं। हिमांशु ने 14 साल तक दुबई, मस्कट में टेलीकॉम कंपनी के प्रोजेक्ट डिपार्टमेंट में आइटी के हेड पद पर काम किया। लेकिन उनके मन में अपने घर में कुछ अलग करने की इच्छा लंबे वक्त से हिलोरे मार रही थी। हिमांशु जोशी नौकरी के सिलसिले में 2002 में विदेश चले गए थे। उन्होंने तब अपने इस प्रोजेक्ट के बारे में नहीं सोचा था लेकिन धीरे धीरे उनके दिल में घर लौटने की चाहत बढ़ने लगी। लिहाज़ा बिना किसी सरकारी सहायता और प्रोत्साहन के हिमांशु ने वो कर दिखाया जो लोग सिर्फ सोचते रह जाते हैं। हिमांशु ने स्वदेश लौटकर ऑर्गेनिक फॉर्मिग को अपना करियर चुना। हालांकि हिमांशु का घर लौटना भी किसी कारण से ही हुआ। दिसंबर 2015 में पिता की तबियत खराब हुई तो फरवरी 2016 में वो घर आ गए और कोटाबाग के पतलिया के कूशा नबाड़ में अपनी 14 बीघा जमीन पर जैविक खेती शुरू कर दी। ऑर्गेनिक खेती के बढ़ते स्कोप ने उनको ये संकल्प लेने पर मजबूर कर दिया कि वो रासायनिक खाद मुक्त खेती ही करेंगे। इसके बाद हिमांशु ने बंजर भूमि को जैविक खेती लायक बनाकर चमत्कार कर दिया । हिमांशु ने अपने मिशन में लगातार आगे बढ़ते रहे। और अपने फॉर्म हाउस पर उन्होंने अमरूद, आम, लीची, कटहल, बेर, अंजीर, लीची, चीकू आदि के पेड़ लगाए। इसके अलावा मल्टीपल फॉर्मोकल्चर के तहत अरहर, गहत, चना, उड़द, भट आदि दलहनी फसलों के साथ टमाटर, हल्दी, अदरक की खेती भी शुरू की। जिसका नतीजा उन्हें जल्द ही मिलना शुरू हो गया। अब हिमांशु पूरी तरह जैविक रूप से उगाई गई फल, सब्जियों व दालों को देश के तमाम शहरों के साथ ही कुरियर से विदेश भी भेज रहे हैं।

खेती के नए मॉडल से मिला आइडिया

हालांकि पहाड़ों पर खेती करना बिल्कुल भी आसान है लेकिन हिमांशु ने इसे पूरी तरह से गलत साबित कर दिया।हिमांशु ने पॉली क्रॉपिंग मॉडल की मदद से अपनी खेती को गुलज़ार कर लिया। हिमांशु कहते हैं कि ”जब एक स्थान पर किसान एक ही फसल उगाता है तो उसे मोनो क्रॉपिंग मॉडल कहते हैं, जबकि पॉली क्रॉपिंग में विभिन्न प्रकार की खेती एक साथ की जाती है। हॉर्टिकल्चर के साथ ही मसाले, हल्दी, गहत, उड़द, अरहर, अमरूद आदि एक साथ उगाए जाते हैं। इस मॉडल में किसान को एक से नुकसान हुआ तो दूसरे से फायदा हो जाता है। अमेरिका, कोरिया में ऐसी खेती काफी प्रचलित है”। हिमांशु ने इस पर पहले खूब रिसर्च की। जिससे उन्हें काफी फायदा पहुंचा।

रिवर्स माइग्रेशन को लेकर मुहिम

फार्म में की जा रही खेती की मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए हिमांशु गौमूत्र का छिड़काव करते हैं। इस काम में उनके पड़ोसी मदद करते हैं। हालांकि हिमांशु के इस प्रोजेक्ट को उद्यान विभाग के अधिकारी देखने आए ज़रूर लेकिन अब तक कोई सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिला। हालांकि हिमांशु का मानना है कि सरकार को अगर रिवर्स पलायन को बढ़ावा देना है तो स्वरोजगार के इच्छुक युवाओं को मदद देनी चाहिए।

Organic Farming और Farm House का बेजोड़ मिश्रण

जंगल के किनारे होने की वजह से हिमांशु ने अपने फॉर्म हाउस का नाम ‘फॉरेस्ट साइड फार्म’ रखा। खेती के अलावा हिमांशु ने इसी जगह पर अपना Farm house भी खड़ा किया। जहां विदेशों से भी लोग वहां आकर रहते हैं औऱ साथ ही organic farming के गुण भी सीखते हैं। हिमांशु दोनों ही तरीकों से कमाई करते हैं। हिमांशु की सोच ने ही उन्हें लाखों में खेलने का मौका तो दिया ही साथ ही आस पास के लोगों को रोजगार भी दिया।

वाकई हिमांशु की ये पहल सराहनीय है। उन्होंने पहाड़ पर रोज़गार के विकल्प खोले हैं। वो अपने गांव को ग्लोबली कनेक्ट कर चुके हैं। अपनी सोच से वो अपने गांव में खेती कर आज लाखों कमा रहे हैं। यही नहीं उनके फॉर्म हाउस पर कई विदेशी पर्यटक ठहरने के लिए आते हैं। यानी हिमांशु ने एक ऐसा मॉडल तैयार किया जिसने उन्हें मालामाल तो किया ही साथ ही उन्होंने गांव में रोज़गार के साधन भी पैदा किए। उनकी इस मुहिम को हमारा सलाम….


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