मिलिए उत्तराखंड की आयरन लेडी से, लोगों की बंजर ज़मीन पर हल चलाकर करती हैं गुज़ारा

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महिला शक्ति का एक रुप होती है। शक्ति ये रुप कई तरह से आपको देखने को मिल सकता है। उत्तराखंड की धरती पर भी एक ऐसी महिला है जिसने सर्वशक्तिशाली बन कर धरती का सीना चीरने के लिए हल चलाने का फैसला लिया। हालांकि ये हालातों से लड़ने का हुनर ही था कि इस महिला ने हल उठाया और कई परिवारों की बंजर पड़ी ज़मीन को उपजाऊ बनाकर अपनी आर्थिकी को मज़बूत किया। इस महिला को गांव के लोग अब आयरन लेडी के नाम से जानते हैं।

आंसू ला देगी कौशल्या देवी की कहानी

कौशल्या देवी रावत एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनकी शादी कई साल पहले बनगढ़स्यूं विकास खंड कोट, पौड़ी गढवाल से ग्राम कठुड सितोंनस्यूं में हुई। लेकिन कौशल्या की किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। पति शराब की लत में उलझ गया और ऊपर से आर्थिक तंगी ने कौशल्या देवी के परिवार को मुसीबत की आग में झोंक दिया। सिर पर चार बच्चों की परवरिश का भी भार था, जिनमें तीन बेटियां और एक बेटा। लेकिन फिर भी परिवार का हर दुख उनके परिवार ने हंसते हंसते झेला। उस समय भी इस परिवार की खुशियों की कड़ी कौशल्या देवी ही थीं। लेकिन नियति ने तभी कौशल्या देवी की ज़िंदगी में भूचाल ला दिया। शराब के नशे में पति की गिरकर मौत हो गई और फिर कौशल्या देवी की जीवन के संघर्ष की दास्तां और भी स्याह होती चली गई।

बंजर खेतों को जोतकर की बच्चों की परवरिश

पहाड़ की महिलाओं की खास बात ये होती है कि उन्हें पहाड़ जैसी मुश्किलों को अपने जीवन में आत्मसात करने की क्षमता बचपन से ही होती है।साथ ही चट्टान जैसे इरादे पालना और हौसलापरस्त होना, इन पहाड़ी महिलाओं की शान होती है। कौशल्या देवी के पास भी ये हुनर मौजूद था और चुनौतियों से लड़ने की ताकत भी। लिहाज़ा उनहोंने अपने चारों बच्चों को पालने की हिम्मत जुटा ली। गरीबी से लड़ते हुए कौशल्या ने पहले कुली का काम शुरु किया। गांव में ही किसी का सामान ढोना हो या फिर सामान को पहाड़ से नीचे या फिर ऊपर ले जाना हो, कौशल्या ने अपने कंधे मज़बूत किए और इसी से अपने काम की शुरुआत की।इसी सामान ढोने के काम से कौशल्या देवी ने जैसे-तैसे 10 हजार रुपए जमा किए।उन्हीं पैसों से कौशल्या देवी ने एक जोड़ी बैल खरीदे। और फिर कौशल्या देवी ने अपनी ताकत का मुजाहिरा करना शुरु किया। कौशल्या देवी अब उन्हीं बैलों पर हल कसती हैं और धरती का सीना फाड़ने निकल पड़ती हैं। कौशल्या देवी उन बंजर खेतों को उपजाऊ बनाती हैं जिन्हें ग्रामीणों ने बंजर छोड़ दिया था।

गांव बंजर होने के डर से कौशल्या ने उठाया हल

कौशल्या ने अपने पति के साथ हल चलाना तो सीख ही लिया था। हल काँधे पर लादा, चूल-बंसुली व बीज उठाया और चल दी खेत जोतने। कौशल्या जानती थी कि सिर्फ अपने खेत आबाद कर देने मात्र से उसका आय का कोई जरिया नहीं बनेगा। लिहाज़ा उन्होंने गाँव के ऐसे परिवार चिन्हित किया जिनके खेत तो थे लेकिन उनका घर में कोई ऐसा संसाधन नहीं था कि उन्हें आबाद किया जा सके। उसने एक एक करके 12 परिवारों की ज़मीन का जिम्मा संभाला और लोगों को समझाया कि खेत बंजर मत छोड़ो नहीं तो गाँव बंजर हो जाएगा। कौशल्या देवी की इसी सोच ने लोगों को अपने खेत पर काम करने के लिए सोचने पर मजबूर किया। कौशल्या देवी सबको समझाती रहीं कि गांव को बंजर मत होने दो, जो मर्जी मेरी दिहाड़ी दे देना, मैं तुम्हारे खेत में हल चलाऊँगी। लोगों को गांव के बंजर होने की आशंका ने डरा दिया और कौशल्या देवी को हल चलाकर बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का काम मिल गया।

पहाड़ के खेतों को जोतना देखने में छोटा काम लगता है लेकिन ये जितना मुश्किल होता है उसे वही समझ सकता है जिसने असल में पहाड़ी खेतों में हल जोता हो।सिटोंनस्यूं की माटी में हल चलाना मतलब हथेलियों को घायल करने जैसा है क्योंकि यहाँ की चुपड़ी माटी है वो भी कुछ बंजर खेतों की जिन्हें आबाद करने सरल बात नहीं है। कई सालों तक दूसरे परिवारों के खेत जोतने के बाद जब ये खबर आस पास के गांवों तक पहुंची तो कौशल्या देवी को बाकी लोगों के भी खेत जोतने के ऑफर मिलने लगे। उन्होंने किसी को भी निराश नहीं किया।कौशल्या देवी के दिमाग में एक ही बात चलती कि अगर खेत बंजर हो गये तो गाँव बंजर हो जायेंगे। फिर जन जीवन कैसा होगा? लिहाज़ा वो अगर खेत जोतने नहीं भी जा सकतीं है तो भी वो इसी बात पर ज़ोर देकर लोगों को खेत जुतवाने की अपील करती हैं कि कहीं गांव बंजर ना हो जाएं।

किसी ने कौशल्या की सुध तक नहीं ली

कौशल्या देवी ने बताया कि अभी वह अपने गाँव कठुड में 8 परिवारों का हल चला रही हैं जबकि इसके अलावा ग्राम नवन, सिरकुन, स्यलिंगी, कंडेलगाँव, जमलागाँव व पंचुर गाँव का भी हल चलती हैं। ताज्जुब की बात ये है कि कौशल्या देवी कोट विकास खंड के बेहद निकटवर्ती गाँवों में हल चलाती हैं। लेकिन आजतक किसी जनप्रतिनिधि ने ना तो कौशल्या देवी के हुनर की तारीफ की, ना ही उनको गरीबी से निकालने की कोई बात की, ना ही कृषि दक्षता पुरस्कार देने की सोची और तो और ना ही कभी कृषि कार्यों को आसान करने के लिए उपकरण मुहैय्या करवाने की सुध ली। लेकिन बिना किसी के परवाह किए कौशल्या अपना फर्ज़ निभाती चलीं जा रही हैं।

शरीर का आधा हिस्सा सुन्न होने पर भी चलाया हल

बच्चों की परवरिश के लिए रात दिन मेहनत ने कौशल्या देवी के बदन का एक हिस्सा सुन्न करना शुरू कर दिया है। महीने में तीन हजार रूपये की दवाइयां आती हैं लेकिन इतने से भी कौशल्या देवी का हौसला नहीं टूटता। वो थकती हैं, फिर उठकर हल चलाती हैं, फिर घर का काम करती हैं और आराम तो जैसे नसीब में लिखा ही नहीं। कौशल्या देवी को अपनी बेटी जो कि 12वीं में पढ़ रही है, उसकी शादी की परवाह है। कौशल्या को एक हजार रुपया पेंशन मिलती है जो तीन माह बाद आती है, जो अक्सर उसके घर का तेल पानी का खर्चा चला लेता है । लेकिन बच्चों की फीस, कपड़े इत्यादि के लिए तो कौशल्या देवी को हल चलाना ही पड़ता है। लिहाजा वो बिना रुके बिना थके ये काम करती चलीं जा रही हैं।

कौशल्या की मदद के लिए आगे करिए हाथ

सचमुच इस आयरन लेडी की जीवटता ने झुकने को मजबूर कर दिया है। कौशल्या को मदद की दरकार है। मजबूरी और हालातों से घिरी इस देवी ने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाए। लेकिन ये कहानी ऐसी है जो हर किसी के दिल पर चोट करने वाली है। इस हल चलाने वाली महिला के हाथों में छाले पड़ते हैं लेकिन वो दिखाती नहीं, ये महिला अपने दिल पर कितना बड़ा बोझ लेकर दिन रात चलती है, वो भी किसी को दिखता नहीं। बच्ची की शादी के लिए पाई-पाई जोड़कर लाल जोड़े में बेटी को विदा करने की ख्वाहिश की उम्मीदें दिन रात बुनती हैं, उसकी भनक किसी को नहीं होती। एक पल भी बिना आराम किए ज़िन्दगी की चक्की में यूं ही पिस रहीं कौशल्या देवी के दर्द को कोई नहीं जानता। जानते हैं तो वो सिर्फ दो बैल जिन्होंने कौशल्या देवी को दिन रात धरती का सीना चीरते हुए देखा है। ये बैल भी कौशल्या देवी के सामने नतमस्तक होंगे तो आप क्यों नहीं। छोटी सी मदद भी कौशल्या देवी के जीवन में रौशनी भर सकती है। क्योंकि किसी बड़े काम की शुरुआत एक छोटी सी पहल से ही होती है। आपके मदद की दरकार का इंतज़ार कौशल्या देवी को हमेशा रहेगी।



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