टीवी से आइडिया लेकर खुद लिखी तकदीर, गांव में अपने हाथों से तैयार किया Tourist Resort

761
Share Now

समस्या सिर्फ पहाड़ में नहीं है। देश के किसी भी कोने के गांवों के युवाओं में शहरों में बसने की सोच बड़ी हो चली है।लेकिन पलायन की समस्या पहाड़ में ज्यादा है इसलिए गांव के गांव वीरान होते जा रहे हैं। सुख-सुविधाओं की चाह, अच्छ रहन-सहन, अच्छी पढ़ाई और रोजगार के अवसर के लिए पहाड़ी युवा शहरों की तरफ जाने से नहीं हिचकिचाते। लोगों की मनस पटल पर ये छप चुका है कि पहाड़ पर उद्योग लग नहीं सकते। पहाड़ में बिना रोजगार के रहा कैसे जाए? लेकिन क्या सोचना सही है? क्या प्रकृति की गोद में रहकर रोजगार करना असंभव काम है? जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी उत्तराखंड के गांव में मौजूद है, जिसने इस तरह की सोच रखने वाले युवाओं को नई दिशा दिखा दी है।

अल्मोड़ा ज़िले के बसौली गांव के खीम सिंह नगरकोटी की ये कहानी आपको भी प्रेरित करेगी। खीम ने 12वीं तक की पढ़ाई गांव के ही सरकारी स्कूल से की और बीकॉम किया अल्मोड़ा से। 2010 में आगे की पढ़ाई के लिए खीम ने हर युवा की तरह दिल्ली का रुख किया। पढ़ाई के दौरान ही खीम को एक सीए फर्म में अकाउंटेंट की नौकरी मिल गई। खीम ने करीब 4 साल नौकरी को दे दिए। तनख्वाह अच्छी थी लिहाज़ा सोचने को ज्यादा कुछ बचा नहीं था। लेकिन उनकी ज़िन्दगी का टर्निंग प्वाइंट बनी 2014 में हुई उनकी शादी। शादी के बाद ही उनकी सोच में परिवर्तन आने लगा। उन्हें लगा कि आखिर मैं अपनी मां के साथ ही क्यों न रहूं। और गांव में जाकर ही कुछ रोजगार क्यों ना करूं। हालांकि सोच और उसे अमली जामा पहनाना इतना भी आसान नहीं होता।

पिता के जल्दी निधन के बाद आ गई जिम्मेदारी

खीम जब हाई स्कूल में थे, तभी उनके पिताजी का देहांत हो गया था। बैंक में सर्विस करने के चलते पिता के बाद उनकी मां को वो नौकरी मिल गई। मां नौकरी करता देख खीम ने सोचा कि उनसे दूर न रहा जाए। गांव से थोड़ी दूरी पर उन्होंने एक कानूनी सलाह देने वाली फर्म में नौकरी कर ली और 3 साल तक काम किया।

टीवी प्रोग्राम से मिला कुछ नया करने का आइडिया

कहानी का असली शुरुआत यहां से होती है। दिल्ली से वापस आने के बाद खीम एनिमल प्लानेट चैनल खूब देखा करते थे।खीम का कहना है कि इसी चैनल से उनके अंदर प्रकृति के प्रति प्रेम बढ़ा और उनके दिमाग में कुछ क्रिएटिव करने का आइडिया आने लगा। इसके बाद खीम ने ठान लिया कि वह कुछ अलग करेंगे और आखिर में 2017 में खीम सिंह ने नौकरी छोड़ दी और गांव वापस आ गए।

उस वक्त उनके छोटे भाई एमकॉम की पढ़ाई कर रहे थे। छोटे भाई को खेतों पढ़ाई करने का शौक था। उन्होंने सोचा कि क्यों न इन बंजर पड़े खेतों का कुछ किया जाए। ये आइडिया दोनों भाइयों को क्लिक कर गया। उन्होंने शांति के लिए शहरों से आने वाले लोगों को पर्यटन के लिहाज से एक अच्छा डेस्टिनेशन उपलब्ध कराने का प्लान तैयार कर लिया खीम ने सोचा कि क्यों न ऐसा माहौल तैयार किया जाए, जिसमें गांव के लोग 30-35 साल पहले रहते थे। लिहाज़ा उनहोंने अपने रिसॉर्ट में उन सब चीज़ों को शामिल किया जिसे पुराने लोग आज़माते थे।

पुरानी सोच का नया Tourist Resort

दोनों भाइयों ने लैंप और कैंडल की रोशनी में खाना, मड हाउस, योग केंद्र, रात में कैंपफायर पूरी तरह प्राकृतिक चीजों के बीच रहन-सहन की व्यवस्था की। तेजपत्ता, तुलसी और कई प्राकृतिक औषधीय गुणों वाली चीजों से चाय बनाकर पिलाना शुरू की। खाना बनाने का तरीका देसी और खाने का भी, जिससे खाने वाले पर्यटक का जायका बढ़ता चला गया। जंगल में बेकार पड़े खेतों को खोदा गया। घास और सब्जियां उगाई गईं और धीरे-धीरे इसे व्यवसाय के रूप में खड़ा किया गया। और देखते ही देखते उनकी इस सोच को बड़े शहरों के लोगों ने अपनाना शुरू कर दिया। साल भर अब खीम के रिसॉर्ट में सैलानियों का तांता लगा रहता है।

चुनौतियों से लड़कर हासिल की जीत

शुरूआत में किसी पर पैसे नहीं होते खीम पर भी नहीं थे लिहाज़ा उन्होंने जंगल की लकड़ियों और तिरपाल की मदद से टेंट लगाए। एक साल तक कम संसाधनों में ही व्यवस्था की। इस दौरान गिने-चुने ग्राहक ही आए। जब लोगों को कैंप के बारे में जानकारी हुई तब लोगों का आना शुरू हो गया। शुरू में करीब एक लाख रुपये खर्च किए गए और बाद में पक्का व्यवसाय बनाने के लिए उन्होंने घर से पैसे लिए और 9-10 लाख रुपये का लोन कराया।लोन लेने में उनका काफी समय लग गया। कई बैंकों ने उनके प्लान को फेल मानते हुए लोन देने से मना कर दिया लेकिन खीम ने हार नहीं मानी और करीब तीन महीने की भागदौड़ के बाद एक दिन उन्हें लोन मिल गया। अब खीम कहते हैं कि वह अपने काम से काफी खुश हैं। यह भी कहते हैं कि मेरा संघर्ष लगातार जारी है।


Share Now