बेमौसमी सब्ज़ियों से मालामाल हुए भीमताल के चांफी गांव के किसान, लोकेश ने बदली तस्वीर

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उत्तराखंड को प्रकृति ने जो दिया है उसे जो समझ जाता है वो अपनी जगह राजाओं की तरह जीता है। प्राकृतिक संपदा से भरपूर उत्तराखंड में आप कहीं भी ऐसा काम कर सकते हैं जो आपकी कमाई को दिन दूनी रात चौगना कर सकता है। लेकिन इसके लिए प्रकृति के मिजाज़ और बिज़नेस दोनों का तालमेल बिठाना लाज़िमी होता है। नैनीताल ज़िले के अल्चौना गांव, चांफी में लोकेश वर्मा जाना पहचाना नाम बन गए हैं। वो खुद को जैविक किसान यानी ऑर्गेनिक किसान कहलवाना ज्यादा पसंद करते हैं। 30 वर्षीय लोकेश वर्मा के पिताजी भी किसान हैं लेकिन लोकेश की किसानी की चर्चा दूर-दूर तक लोकप्रिय है। 

बेमौसमी सब्ज़ियों के सरताज लोकेश

लोकेश अपने खेत में बेमौसमी सब्ज़ियां उगाकर धाकड़ कमाई करते हैं। अपनी तकनीक से वो आस पास के दूसरे किसानों के लिए एक मिसाल बन चुके है। लोकेश ऐसी सब्ज़ियों पर काम करते हैं जिसकी डिमांड बाज़ार में बारह महीनों रहती है। लिहाज़ा वो बेमौसमी सब्ज़ियों पर ही काम कर रहे हैं। खास बात ये है कि चांफी जैसी जगह में मिट्टी बेहद उपजाऊ है। कलसा नदी के होने की वजह से यहां की मिट्टी में नमी ज्यादा रहती है जिस वजह से बेमौसमी सब्जियों को उगाने में ज्यादा माथापच्ची नहीं लगती। सबसे खास बात तो ये है कि यहां बिना पॉलीहाउस तकनीक के ही बेमौसमी सब्ज़ियों का उत्पादन हो जाता है। लोकेश जितनी भी सब्ज़ियों को अपने खेत में उगाते हैं वो सब दिल्ली जैसे महानगर की मंडियों में आसानी से पहुंच जाती हैं और कीमत भी मुंह मांगी मिलती है। यही नहीं बेमौसमी सब्जियों के मुरीद खुद चलकर इनके खेत तक आते हैं।

मांग के मुताबिक उगाते हैं सब्ज़ियां 

सिर्फ बारहवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाले लोकेश वर्मा को बाजार का रुख बखूबी पता होता हैं। यही वजह है कि इनके खेत में सबसे ज्यादा वही सब्ज़ियां उगाई जाती है, जिसकी मांग शादी समारोह में सबसे ज्यादा होती है। लोकेश अपने खेत में गोभी, टमाटर, मटर, आलू, शिमला मिर्च, नींबू, पत्ता गोभी, भिंडी, करेला जैसी सब्जियां उगाते हैं जिनकी डिमांड काफी होती है। लोकेश ने अपने खेत में पहले पालक, धनिया और मेथी की खेती से शुरूआत की। सब्ज़ियों के अलावा लोकेश अपने खेत में पहाड़ी हल्दी, धनिया, मिर्च भी बड़ी मात्रा में उगाते हैं। इसके अलावा मेडिसिनल हर्ब्स को भी वो बखूबी परखना जानते हैं जिसकी मार्केट में काफी मांग रहती है और जो हाथों हाथ बिक भी जाती हैं। लोकेश का इलाके के किसानों से पूरा संपर्क है। वो जैविक खेती के नुस्खे सिखाने दूरस्थ इलाकों में भी जाते हैं और किसानों को जैविक खेती करने की प्रेरणा भी देते हैं। लोकेश ने कुछ साल पहले स्ट्रॉबेरी की खेती से भी अच्छी कमाई की थी। माल्टा, आड़ू और खुमानी जैसे फलों को लोकेश सीधे दिल्ली भेजते हैं। इस प्रगतिशील किसान की खास बात ये है कि बड़े बड़े महानगरों में उनके रेग्यूलर क्लाइंट्स मौजूद हैं जो हर महीने या फिर हर मौके पर लोकेश से फल, हल्दी या फिर हर्ब्स आदि की मांग करते हैं और लोकेश कहते हैं कि 

‘’ हमसे ग्राहक सीधे क्यों जुड़ा है इसकी खास वजह ये है कि एक रात में ही हम फलों या सब्ज़ी की डिलीवरी दिल्ली तक कर देते हैं। अच्छी सर्विस से लोगों में भरोसा जगता है और आपके वो हमेशा-हमेशा के लिए ग्राहक बन जाते हैं। इसी तरह की खेती बाड़ी से ही हम सालाना 8 से 10 लाख की इनकम कर लेते हैं।  ’’

बेमौसमी टमाटर के लिए लोकप्रिय है अल्चौना गांव  

अल्चौना गांव के किसान पहले से ही बेमौसमी सब्ज़ियों का उत्पादन करने में माहिर हैं लेकिन मौजूदा हालात को लोकेश वर्मा जैसे किसान ने समझा और उसे एक किसानी का बेहतरीन मॉडल बना दिया।  वैसे देखा जाए तो अल्चौना के काश्तकार भीम सिंह बिष्ट का भी बहुत नाम है जिन्होंने अल्चौना क्षेत्र में सर्वप्रथम 1982 में हाईब्रिड टमाटर की खेती की शुरुआत की थी। इन्हें देखकर क्षेत्र के अन्य काश्तकारों ने भी टमाटर की खेती करनी शुरू की। वर्तमान में चॉफी, अल्चौना, बेलवालगांव, ताडा क्षेत्र में टमाटर की बंपर पैदावार हो रही है और ग्रामीणों की टमाटर मुख्य खेती बन चुकी है। वहीं आनंदमणि भट्ट जैसे प्रगतिशील किसान हैं जो जैविक खेती से जुड़े क्षेत्रों में प्रचार-प्रसार के लिए विख्यात हैं। यानी अल्चौना,चांफी की किस्मत इन किसानों ने ही संवार रखी है। नैनीताल के इस ब्लॉक में लोकेश ने दूसरे किसानों को परम्परागत फसलों से नकदी फसलों और बेमौसमी सब्जी उत्पादन की ओर प्रेरित किया। परम्परागत खेतीबाड़ी से 4 से 5 हजार रुपये प्रति कनाल कमाने वाले यहां के किसान बेमौसमी सब्जी का उत्पादन कर 25 हजार रुपये प्रति कनाल तक कमा रहे हैं।  

किसी ने सही कहा है कि गांव में अगर एक भी प्रगतिशील किसान है तो गांव की किस्मत बदल जाती है। लोकेश वर्मा जैसे जैविक किसान ने अपने क्षेत्र में बेमौसमी सब्‍ज़ियों को उगाकर ना सिर्फ कमाई का ज़रिया पैदा किया बल्कि दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गए हैं। उनकी किसानी की ये कला गांव को खुशहाल बनाने में ज्यादा देर नहीं लगाएगी। 


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