तो क्या रेड ज़ोन से आ रहे प्रवासियों ने बिगाड़ दिया उत्तराखंड का रिकॉर्ड?

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पिछले पांच दिन में उत्तराखंड में कोरोना का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ा है। खास बात ये थी कि बाकी राज्यों के मुताबिक उत्तराखंड में अब तक के हालात पर काफी कंट्रोल था लेकिन अचानक से जो हुआ है उसने राज्य सरकार की नींद उड़ा दी है। दरअसल कोरोना प्रभावित राज्यों के रेड जोन से लौटे रहे प्रवासियों से उत्तराखंड में कोरोना की जंग रणनीतिक तौर पर कमजोर पड़ने लगी है। जिन रेड ज़ोन से लौटे ये प्रवासी अपने घरों को यहां पहुंचे हैं उससे कोरोना को राज्य में पैर पसारने का मौका मिल गया है। मुसीबत की बात तो ये है कि कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ने के साथ ही संक्रमण का ग्राफ भी रफ्तार पकड़ चुका है। पिछले पांच दिनों में उत्तराखंड में सबसे ज्यादा संक्रमितों के मामले सामने आए हैं। राज्य में अब तक 298 केस सामने आ चुके हैं। जिससे आम लोगों में भी दहशत बढ़ रही है।

सरकार के अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक बाहरी राज्यों से उत्तराखंड लौटने वाले प्रवासियों की संख्या पांच लाख तक पहुंच सकती है। जबकि अभी तक डेढ़ लाख से अधिक प्रवासी अपने गांव लौटे हैं। यानी उत्तराखंड में महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, गुरुग्राम से लौटे प्रवासियों में सबसे ज्यादा कोरोना मरीज़ों के मामले सामने आ रहे हैं। अब तक मिले संक्रमितों में 60 प्रतिशत से ज्यादा प्रवासी हैं जो बाहरी राज्यों के रेड ज़ोन इलाकों से लौटे हैं। यानी आने वाले समय में कोरोना संक्रमण को लेकर स्थिति और भी गंभीर और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

अपने स्तर पर सरकार बेहतरीन काम कर रही है। कोरोना से जंग में सरकार अगर इतनी सजग नहीं होती तो इतने मामले सामने भी नहीं आते। और अगर ये मामले सामने नहीं आते तो अंजाम कितना बड़ा हो सकता था ये भी सोचनीय विषय है। बहरहाल पिछले एक सप्ताह में स्वास्थ्य विभाग ने कोविड-19 की जांच का दायरा बढ़ाने से संक्रमण को लेकर असल तस्वीर सामने आने लगी है। प्रतिदिन एक हजार से अधिक सैंपल जांच के लिए भेजे जा रहे हैं। सरकारी लैब में पूल सिस्टम से जांच करने से कोरोना पॉजिटिव मामलों का ग्राफ बढ़ रहा है। इससे यह भी साफ है कि प्रदेश में अब संदिग्धों के सैंपल और जांच दोनों में तेजी आई है। इसका दावा सरकार कर भी रही है और पूल टेस्टिंग और पूल सैंपलिंग होने से अब संक्रमण के मामले अधिक सामने आने भी लगे हैं। अब प्रदेश सरकार पर होम क्वारंटीन और संस्थागत क्वांरटीन की फूल प्रूफ व्यवस्था करने की जिम्मेदारी भी आ पड़ी है। ज़ाहिर है सरकार अपनी कोशिशों में कारगर साबित हो रही है लेकिन साथ ही साथ सरकार को दोधारी तलवार से भी सामना करना पड़ रहा है। दिक्कत ये है कि प्रवासी अगर घर नहीं लौटेंगे तो जाएंगे कहां और अगर घर लौटेंगे तो इतनी बड़ी मुसीबत से निपटना सरकार के लिए चुनौती भी लेकर आएगा।


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