40 लाख की विदेशी नौकरी छोड़ देवभूमि की विरासत संजोने में जुटे पवन, जुनून से बदली गांव की किस्मत

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आज का युवा क्या चाहता है, अच्छी पढ़ाई के बाद उसे मोटी इनकम वाली नौकरी मिले और ये नौकरी भी अगर विदेश में हो तो फिर तो कहने ही क्या। देहरादून के पवन पाठक की नौकरी भी विदेश में लगी थी। 3.50 लाख रूपए महीना यानी 40 लाख रुपए सालाना का पैकेज भी हाथ में था। लेकिन पवन पाठक ने इसी नौकरी को अपने जुनून के खातिर लात मार दी। 35 साल के पवन विदेश में अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ उत्तरकाशी जिले के नौगांव ब्लॉक स्थित ढुईंक गांव में पहाड़ लौट आए। यहां आकर उन्होंने पहाड़ों को संवारने का जिम्मा उठाया। पवन लंबे वक्त से पहाड़ों की विरासत को संजोने में जुटे हुए हैं। पवन का उद्देश्य उत्तराखंड की सबसे बड़ी परेशानी पलायन को रोकना था लिहाज़ा उन्होने ने बंजर पड़ी खेती को आबाद करना शुरूु किया। यही नहीं उन्होंने पहाड़ के पुराने तौर तरीकों से बने घरों यानी पौराणिक मकानों को नवजीवन प्रदान करने का प्रयास भी शुरू किया।इसके साथ ही पवन ईको कंस्ट्रक्शन पर भी खासा ज़ोर दे रहे हैं। पवन की इस मुहिम में विदेशी छात्र-छात्रएं भी हाथ बंटा रहे हैं।

पवन पाठक देहरादून में इंदिरानगर के निवासी हैं। पढ़ाई देहरादून से ही हुई जिसके बाद उनहोंने यहीं से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक भी किया जिसके बाद साल 2013 से 2016 तक उन्होंने जर्मनी में फार्मा मॉडलिंग में एमबीए किया। इस दौरान उन्हें जर्मनी की एक कंपनी में 3.5 लाख रुपये का मासिक पैकेज भी मिल गया। पवन नौकरी तो कर रहे थे लेकिन उनका मन पहाड़ों में ही बसा रहा। लिहाज़ा मन में कुछ नया करने का जुनून और चाहत लिए वो वापस पहाड़ आ गए। पंकज ने बताया कि मार्च 2018 से वह डामटा के निकट ढुईंक गांव में फार्मा मॉडलिंग का कार्य करने में जुटे हैं।

पवन की ये मुहिम रंग लाने भी लगी।उनके इस मिशन में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) रुड़की से पीएचडी कर रहीं नीदरलैंड की मारलुस भी दे रही हैं। मारलुस को भी उत्तराखंड के पहाड़ और वहां की संस्कृित बेहद भाती है लिहाज़ा वो पवन के साथ मिलकर यहां के रंग में रच-बस चुकी हैं। पवन ने वर्ष 2018 में एक हेक्टेयर ज़मीन ली। इसके पीछे भी उनका अलग मकसद छुपा हुआ था। पवन ने इस ज़मीन पर सेब के करीब दो दर्जन पेड़ लगाए। पवन के इस मिशन को देखते हुए ग्रामीणों ने भी एक हेक्टेयर भूमि उन्हें अपने काम के लिए दे दी।हालांकि गांव वालों की ये ज़मीन सालों से बंजर पड़ी हुई थी। अपने फार्म से पवन ने करीब दो लाख रुपये के जैविक सेब भी बेचे। यही नहीं पवन ने सेब के अलावा राजमा, आलू, दाल, मक्का, गेहूं आदि की फसलें तैयार करने में जुटे हुए हैं। पवन की इस मुहिम ने पूरे गांव की रंगत बदल दी है। यहां अब किसान भी पवन का साथ देने में जुटे हैं। पवन का जुनून उन्हें यहां से बहुत दूर ले जाएगा इसमें कोई शक नहीं। पवन ने गांव की किस्मत बदलने का जिम्मा उठाया है वो अपने मिशन और मकसद में जरूर सफल होंगे। पवन की ये कहानी बाकी लोगों को भी प्रेरित करेगी जिन्हें वाकई अपने लोगों अपनी जगह के लिए कुछ करने का जुनून है।


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