वीडियो : पीएम मोदी ने गिनाए पहाड़ी अनाज मंडुए के फायदे, उद्यमियों को दी खास सलाह

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पीएम नरेन्द्र मोदी ने आसान भाषा में इस गलत अंतर को सबके सामने रख दिया कि कुछ अनाजों को गरीबी और अमीरी के चश्मे से देखा जाता है। जबकि न्यूट्रीशन्स को गरीब को भी चाहिए और अमीर को भी। लिहाज़ा ऐसे पहाड़ी अनाज जो आज तक अपने अस्तित्व को तलाश रहे थे, वो आज न्यूट्रीशनल वैल्यू के आधार पर दुनिया भर में भारी डिमांड में आ पहुंचे हैं। जिनमें पहाड़ी अनाज मंडुआ सबसे ऊपर है। इस अनाज को कई नामों से जाना जाता है। मसलन – मडुआ, मंडुआ, क्वादु और कोदा। हालांकि इस सोच को आखिर किसने जन्म दिया कि मोटा अनाज गरीबों का अनाज है, लिहाज़ा मंडुआ भी लंबे वक्त तक इसी सोच की भेंट चढ़ा रहा, जिसको पूछने वाले चंद लोग हुआ करते थे। हालांकि पुराने ज़माने में ये मंडुआ हर परिवार की थाली का हिस्सा था लेकिन युवा पीढ़ी के जीभ को इसका स्वाद हमेशा फीका ही लगा। लिहाज़ा ये अनाज हर घर की थाली से गायब होने लगा। ऊपर से इसके सीमेंट जैसे रंग ने और भी आग में घी डालने का काम किया।हालांकि जैसे जैसे ये अनाज पहाड़ी थालियों से गायब हुआ वैसे वैसे ही बीमारियों ने घर में दस्तक देनी शुरु कर दी। और मजबूरी में ही सही लोगों को हाई न्यूट्रिशन वाले अनाजों की तरफ मुंह मोड़ना पड़ा, भले ही उसका स्वाद फीका हो या फिर रंग काला।

पहाड़ी अनाज के लिए उमड़ा मोदी का प्रेम

प्रधानमंत्री मोदी का ये छोटा सा वीडियो साफ कर देगा कि उत्तराखंड में ऐसे अनाज जिनकी न्यूट्रीशनल वैल्यू बहुत ज्यादा है उनकी ब्रांडिंग पर ज़ोर देना होगा। ऐसे उद्यमी जो मंडुए जैसे मोटे अनाज का बिज़नेस करते हैं उनके लिए इन अनाजों को ब्रांडिंग कर मार्केट में उतारना होगा। क्योंकि लोग अब ऐसे अनाजों की कद्र जान चुके हैं। खुद मोदी के भाषण में सुनिए कि कैसे मंडुए जैसा अनाज आज लोगों की थाली में वापस आ रहा है और इसका व्यापार कैैसे उद्यमियों को नई दिशा दे सकता है।

मंडुए जैसे पहाड़ी अनाज पर मोदी की सलाह

वीडियो : पीएम मोदी ने गिनाए मंडुए के फायदे, पहाड़ी उद्यमियों को दी खास सलाह : Detailed Story Coming Soon

Gepostet von UK Stories am Freitag, 17. April 2020

केन्द्र सरकार की पहल पर अब इन अनाजों को खेती के लिए भी पहले से ज्यादा ज़ोर दिया जा रहा है। किसान भी इसकी खेती से सीधा लाभ उठा सकते हैं। यानी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के सीढ़ीनुमा खेतों में इस खरीफ सीजन से न सिर्फ मंडुवा-झंगोरा की फसलें व्यापक पैमाने पर लहलहाएंगी, बल्कि किसानों की झोलियां भी खूब भरेंगी। केंद्र सरकार की परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) में ऐसे ही अनाजों की खेती पर विशेषकर ज़ोर दिया गया है। इसके तहत उत्तराखंड में कुल 3900 क्लस्टर्स पर काम चल रहा है जिसमें मंडुवा-झंगोरा के 1482 क्लस्टर शामिल किए गए हैं। केन्द्र सरकार की इस योजना में हर क्लस्टर 50 एकड़ का तय किया गया है। इससे मंडुवा-झंगोरा के क्षेत्रफल में 30 हजार हेक्टेयर से अधिक की बढ़ोतरी होगी। यही नहीं, मंडुवा-झंगोरा को सरकारी स्तर पर खरीदने की व्यवस्था शुरू कर दी गई है।

हर ज़िले में विकसित होंगे मंडुआ-झंगोरा के क्लस्टर्स

हालांकि राज्य सरकार भी मोटे अनाजों की खेती पर खासा ध्यान दे रही थी लेकिन खेती के क्षेत्रफल के गिरते आंकड़ों से पता चला कि गांवों से निरंतर हो रहे पलायन, मौसम की बेरुखी, वन्यजीवों द्वारा फसल क्षति, उत्पाद का उचित दाम न मिलने समेत अन्य कारणों से किसान मंडुवा-झंगोरा की खेती से विमुख हो रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में वर्ष 2010-11 तक पहाड़ में खरीफ की क्रमश: दूसरी और तीसरी फसलों में शुमार मंडुवा व झंगोरा का क्षेत्रफल 179442 हेक्टेयर था। जो 2018-19 में यह घटकर 140684 हेक्टेयर पर आ गया। इस बीच केंद्र सरकार ने कृषि को प्रोत्साहित करने के मद्देनजर परंपरागत कृषि विकास योजना की शुरुआत की तो इससे उत्तराखंड के किसानों को ताकत मिली। इसके तहत प्रदेशभर में क्लस्टर आधार पर खेती को बढ़ावा देने का निश्चय किया गया और 3900 क्लस्टर को मंजूरी मिली। इसमें 11 जिलों में मंडुवा-झंगोरा के 1482 क्लस्टर शामिल किए गए। कोशिशें ये हैं कि इस खरीफ सीजन से मंडुवा-झंगोरा के ये क्लस्टर अस्तित्व में आ जाएं। 50-50 एकड़ के इन क्लस्टरों के विकसित होने से जहां क्रेताओं को एक ही जगह पर यह फसलें उपलब्ध हो सकेंगी, वहीं किसानों को इसका बेहतर दाम भी मिलेगा। 

मंडुवा-झंगोरा के क्लस्टर पर सरकार की योजना

सरकारी योजना के तहत मंडुआ-झंगोरा की खेती को क्षेत्रफल के हिसाब से ज़ोन में बांटा गया है। इनमें किस ज़िले में कितने क्लस्टर्स होंगे इसकी रूपरेखा तैयार की गई है। मसलन चमोली में 357, पौड़ी में 247, उत्तरकाशी में 203, पिथौरागढ़ में 151, नैनीताल में 104, चंपावत में 94, टिहरी में 92, अल्मोड़ा में 82, बागेश्वर में 81, रुद्रप्रयाग में 64  और देहरादून में 07 क्लस्टर डेवलेप किए जा रहे हैं।

देखा जाए तो पर्वतीय क्षेत्र में किसान तमाम कारणों के चलते खेती से विमुख हो रहे थे। लिहाज़ा सरकारी योजना में मंडुवा-झंगोरा जैसी परंपरागत फसलों को परंपरागत कृषि विकास योजना में रखा गया है। साथ ही उत्पादित फसलों को उचित दर पर खरीदने की व्यवस्था भी की गई है। इन सब प्रयासों से न सिर्फ खेती के प्रति लोगों की उदासीनता खत्म होगी, बल्कि उन्हें अच्छी आय भी होगी।

क्या है पहाड़ी अनाज मंडुआ / फिंगर मिलेट (Finger Millet)?

मंडुवा, ये मोटे अनाज की श्रेणी में आता है। इसका अंग्रेजी नाम है फिंगर मिलेट और वानस्पतिक नाम है एलोओसाइन कोरोकैना (Eleusine Corocana.) उत्तराखंड में ये परंपरागत रूप से पैदा की जानी वाली फसल है। इसकी खेती राज्य के चंपावत, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा व नैनीताल के पर्वतीय हिस्सों तथा गढ़वाल के अन्य पर्वतीय जिलों में हो रही है। यह खरीफ की फसल है इसका उपयोग मुख्यत: जाड़ों में किया जाता है। समूचे उत्तराखंड में मडुवे का उत्पादन 1,12,881 हेक्टेयर क्षेत्रफल में होता है। इसमें प्रोटीन, खनिज आदि पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।

सूखा सहन करने की क्षमता रखने वाली मडुवे की पैदावार प्राचीन समय से ही राज्य के पर्वतीय अंचलों में होती रही है। इसकी खेती ढालू, कम उपजाऊ व बारिश पर आश्रित भूमि पर की जाती है। मडुवा विपरीत परिस्थितियों में भी पैदा किया जा सकता है, यही कारण है कि सिंचाई के साधनों के अभाव वाले क्षेत्रों में किसान इसकी उपज आसानी से कर सकते हैं।

चावल व गेहूं की तुलना में अत्यधिक केल्सियम, थार्यामन व रेशे होने की वजह से इसकी पौष्टिकता अधिक होती है। अधिक रेशा, प्रोटीन, एमीनो एसिड, खनिज तत्व से भरपूर मडुवे का सेवन मधुमेह के रोगियों के लिए लाभकारी होता है। इसमें भरपूर मात्र में आयरन होने के साथ ही फाइबर, अमीनो अम्ल, आयरन, फोलिक एसिड, प्रोटीन, मिनरल्स, ट्रिपटोफैन, मिथियोयीन, लेशीयोयीन आदि पौष्टिक तत्व मौजूद हैं। इसमें मौजूद तत्व इसे पौष्टिकता और औषधीय गुणों से भरपूर बनाते हैं। मडुवे से रोटी, हलुवा, बिस्किट, केक जैसे व्यंजन तैयार किए जाते हैं।

मडुवे की खेती बरसात में होती है। जुलाई के प्रथम सप्ताह में इसकी पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। रोपाई के एक पखवाड़े से बीस दिन के भीतर पहली निराई तथा एक माह से पैतीस दिनों के भीतर दूसरी निराई करनी होती है। कृषि विभाग द्वारा मडुवा उत्पादन को बढ़ाने के लिए किए गए प्रयास अब रंग लाने लगे हैं। वर्तमान में चंपावत समेत लोहाघाट, पाटी व बाराकोट में बड़े पैमाने पर मडुवा पैदा किया जा रहा है। इस कार्य में कृषि विभाग द्वारा किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। मडुवे का उत्पादन किसानों के लिए हर प्रकार से लाभ का सौदा है।

बाज़ार में छा गया मंडुए का आटा / Finger Millet Flour

आज की तारीख में फिंगर मिलेट उर्फ़ मंडुआ अपने गुणों के अनुरूप अपना अस्तित्व की लड़ाई जीतने में कामयाब रहा।मार्केट में मंडुए के बने प्रोडेक्ट शानोशौकत से आकर्षक पैकेटों में भारी दामों में बिकते हैं। सदियों उपेक्षा का शिकार रहा मंडुआ अब देखते ही देखते बाजार में नयी ऊँचाईयां छूने लगा। आजकल मंडुए के भाव आसमान छू रहे हैं। गेंहू का आटा जहां 40-45 रुपए है तो वहीं मंडुए की कीमत 70 से 80 तक पहुंच गई है। प्रधानमंत्री ने जिस बात पर ज़ोर दिया है उद्यमियों ने ठीक वैसा ही प्रायोजन कर मंडुए के मार्केट में चमक ला दी है। आज अमेजन, फ्लिपकार्ट, इंडियामार्ट, बिगबास्केट जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां मंडुए के बने प्रोडेक्ट को स्पॉन्सरशिप के साथ अपने प्लेटफॉर्म पर जगह देते हैं।आजकल मडुआ में मौजूद पौष्टिक तत्वों व इसकी भारी मांग को देखते हुए इससे नमकीन, बिस्किट, चॉकलेट, नूडल्स, पास्ता आदि आधुनिक लोकप्रिय व्यंजन भी बनाये जा रहे हैं।

मडुआ आज की जीवनशैली में तेजी से बढती जा रही डाइबिटीज और शुगर की बीमारी में यह बहुत राहत पहुंचाता है। इसमें मौजूद 80 फीसदी कैल्शियम हड्डियों को आस्टियोपोरोसिस से बचाता है। लिहाज़ा हेल्थ सेक्टर में इसके बने पोषक ड्रिंक्स, ऑयल व दवाइयों को भी लाने की तैयारी चल रही है। वाकई मंडुए जैसे मोटे अनाज के दिन बदल गए हैं, अगर आप भी अपने दिन बदलना चाहते हैं तो या तो इसकी खेती की तरफ कदम बढ़ाइए या फिर इसके प्रोडक्ट्स का बिज़नेस कीजिए। क्योंकि आने वाले वक्त में ये मंडुवा आपकी किस्मत ज़रुर चमका सकता है इसमें कोई शक नहीं।


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