40 हज़ार की नौकरी छोड़ लौटा गांव, बिना मिट्टी-खाद के सब्ज़ी उगाके कमाने लगा लाखों

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बड़े शहरों की मोटी तन्ख्वाह वाली नौकरी किसे पंसद नहीं। व्हाइट कॉलर जॉब के मायाजाल में सबसे पहले युवा ही फंसता है और फिर दलदल में ऐसा फंसता है कि वहीं का होके रह जाता है। लेकिन वो जिनमें कुछ अलग करने और अपने गांव के लोगों की ज़िंदगियां सुधारने का जज़्बा होता है वो प्रभात रमोला जैसे युवा कहलाते हैं। जी हां, ऐशोआराम की जिंदगी को दरकिनार कर गांव में बिना मिट्टी के खेती करने हौसला लिए प्रभात गांव लौट आए। टिहरी जिले के चंबा ब्लॉक स्थित ग्राम जड़ीपानी निवासी प्रभात रमोला ने चंडीगढ़ में 40 हजार रुपये महीने की नौकरी छोड़कर ये मज़बूत कदम उठाया। इलेक्ट्रॉनिक्स से बीटेक कर चुके प्रभात अब गांव में ही रहकर हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से सब्जियां पैदा कर रहे हैं। हाइड्रोपोनिक्स ऐसी तकनीक है, जिसमें बिना मिट्टी के सिर्फ पानी की मदद से खेती की जाती है। प्रभात अपनी इस नई सोच को और बड़ा करने का प्लान बना चुके हैं।

बड़ी डिग्री के बाद भी लिया खेती करने का फैसला

जड़ीपानी निवासी यशपाल रावत के बड़े पुत्र प्रभात रमोला वैसे तो एक ब्राइट स्टूडेंट रहे, 2013 में देहरादून के एक कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक्स में बीटेक की डिग्री भी हासिल की। और हर पहाड़ी की तरह वो भी बड़े शहरों में नौकरी करने निकल पड़े। तीन साल तक दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे महानगरों में उन्होंने अपने सपनों को नई उड़ान दी लेकिन एक दिन उनके अपने अंदर की आवाज़ सुनाई पड़ी। उनको कुछ नया और हटके करने का जज्बा जाग गया। जिसके बाद उन्होंने गांव लौटने का फैसला कर लिया। हालांकि गांव लौटने के पीछे एक और वजह छुपी थी वो ये कि वो शहरों की चकाचौंध भरी जिंदगी तो आत्मसात नहीं कर पा रहे थे लिहाज़ा मज़बूत फैसला लेते हुए उन्होंने 40 हजार रुपये महीने की नौकरी छोड़, चंडीगढ़ से प्रभात सीधे जड़ीपानी लौट आए।

घर से ही शुरु किया खेती का काम

जड़ीपानी गांव चंबा-मसूरी फलपट्टी क्षेत्र में आता है यानी यहां की जमीन बेहद उपजाऊ मानी जाती है। लेकिन फिर भी प्रभात यहां जमीन के बिना ही सब्जियों का उत्पादन करने जुटे हैं। हल्द्वानी में उद्यान विभाग के दो दिन के ट्रेनिंग शिविर में प्रभात ने हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से सब्जी उगाने का प्रशिक्षण लिया। इसमें पानी की मदद से सब्जी उगाने के लिए पीवीसी (पॉली विनाइल क्लोराइड) पाइप का इस्तेमाल होता है। इसके बाद उन्होंने अप्रैल 2018 में महज 700 रुपये की लागत से अपने पैतृक घर में इसका प्लांट लगाया। तब से घर में ही ब्रोकली, धनिया, सलाद पत्ता, पत्ता गोभी आदि सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं।

ऐसे उगाई जाती हैं सब्जियां 

हाइड्रोपोनिक्स विधि में पीवीसी पाइप में होल बनाए जाते हैं। फिर प्लास्टिक की ट्रे में बीज डालकर उसमें पौधे तैयार किए जाते हैं, जिन्हें पीवीसी पाइप में रखा जाता है। इस दौरान सामान्य पानी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, कैल्शियम आदि न्यूट्रिएंट का मिश्रण तैयार किया जाता है और मोटर की मदद से उसमें पानी डाला जाता है। हर 12 दिन में पानी को बदला जाता है। इसके बाद 30 से 45 दिनों में सब्जियां तैयार हो जाती हैं। यह विधि उत्तराखंड में अब तक सिर्फ रामनगर (नैनीताल) के एक उद्यमी अपना रहे थे। हालांकि, दक्षिण भारत में यह विधि काफी लोकप्रिय है।

“जब मैंने जैविक खेती शुरू की तो किसी ने मेरे इस काम की सराहना नहीं की, तब मैंने इस हाइड्रोपोनिक्स खेती पर काम करना शुरू किया।मेरे लिए राह आसान नहीं थी लेकिन नामुमकिन भी नहीं थी। क्योंकि युवाओं को वापस पहाड़ियों की ओर आकर्षित करने के लिए हमें कुछ मजबूत कारणों की आवश्यकता थी, जिनमें कुछ प्रेरणा और अच्छी कमाई भी हो। हाइड्रोपोनिक्स में हम विदेशी सब्जियां जैसे लेट्यूस, केल, चेरी टमारो, स्ट्रॉबेरी आदि उगाते हैं जिनकी बाजार दर बहुत अच्छी है।“

इस तकनीक के अलावा प्रभात ने बिना केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टीसाइड का उपयोग किए बिना सफलतापूर्वक खेती की है। जिसमें उन्होंने ब्रोकोली, रेड कैबेज और मीठे मटर उगाया है।

अब व्यावसायिक उत्पादन की तैयारी 

प्रभात रमोला की मेहनत काम आ गई। धीरे-धीरे उन्हें सुर्खियां हासिल होने लगीं। लिहाज़ा उनकी छोटी आंखों से सपने बड़े होने लगे। प्रभात अब इस तकनीक के सहारे अपने घर की खेती को बड़े लेवल करना चाह रहे हैं। यानी प्रभात ने व्यावसायिक स्तर पर सब्जियों के उत्पादन की तैयारी शुरु कर दी है।प्रभात इसको काफी आगे तक ले जाना चाहते हैं जिसके लिए वो प्रयासरत हैं।

हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से खेती के फायदे

सवाल उठता है कि आखिर गांव में जब ज़मीन उपजाऊ है, इतनी ज़मीन पड़ी है तो फिर खेती घर में ही क्यों? इसके पीछे भी प्रभात पूरा लॉजिक बताते हैं। पहाड़ में सबसे पहले पानी की दिक्कत है। पहाड़ी किसानों की सबसे बड़ी परेशानी ये है कि उन्हें मौसम के मुताबिक ही अपने सिंचाई प्रबंधन की व्यवस्था करनी होती है। लिहाज़ा ये जल संकट किसानों की उम्मीदों को सबसे पहले तोड़ता है। जबकि हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में मिट्टी, खाद, जमीन, कम पानी और कम मेहनत में ही अच्छा उत्पादन किया जा सकता है।हाइड्रोपोनिक्स तकनीक के और भी फायदे हैं जिनको जानना बेहद ज़रूरी है। ताकि किसान या फिर आप जैसे युवा इस खेती के फायदों के बारे में जानकर कुछ ऐसा ही कारनामा कर सकते हैं।

  • हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में मिट्टी के मुकाबले सब्ज़ियों का उत्पादन जल्दी और ज्यादा होता है।
  • इस तकनीक में सब्जियों में कीड़ा या फिर किसी भी प्रकार के रोग की आशंका नहीं रहती 
  • इस तकनीक से उगाई गई खेती पूरी तरह ऑर्गेनिक होती हैं जिसका फायदा बाज़ार आपको देता है।
  • इस तकनीक की विशेषता ये है कि आपको खेतों की तरह ज्यादा मेहनत नहीं करनी होती यानी कम मेहनत में ही सब्ज़ियों का उत्पादन अधिक हो जाता है जिससे आपको पूरा फायदा होता है।
  • पहाड़ों का प्रतिकूल मौसम भी आपकी खेती पर बुरा असर नहीं डाल पाता। इससे आपके उत्पादन पर कभी कोई संकट नहीं आता।
  •  सबसे खास बात ये कि इस खेती को आप पूरी तरह से जंगली जानवरों से सुरक्षित रखने में सफल हो पाते हैं। क्योंकि पहाड़ी ज़िलों में खेती से विमुख हो रहे किसानों की सबसे बड़ी समस्या ही जंगली सुअर व बंदर हैं। 
  • हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में पानी बेहद कम यानी संतुलित मात्रा में प्रयोग किया जाता है। लिहाज़ा सिंचाई के लिए भी आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी और उत्पादन भी अच्छा होगा।

ज़ाहिर है प्रभात जैसे युवा ना केवल पलायन की समस्या से जूझ रहे उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए रिवर्स माइग्रेशन की कड़ी बनकर सामने आए हैं बल्कि अपने साथ-साथ बहुत से बेरोजगारों और किसानों की ज़िन्दगियों को बदलने का फॉर्मूला दे भी रहे हैं। प्रभात की इस नई सोच को हमारा सलाम।


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