वीडियो : लॉकडाउन में फंसे विदेशियों के मसीहा बने हल्द्वानी के शुभम, दुनिया ने किया सलाम

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शुभम धर्मस्क्तू के फोन की घंटियां लगातार बजती हैं। वो हर किसी से 5-10 मिनट बात करते हैं और यही कहते नज़र आते हैं, ठीक है- मै देखता हूं आपकी क्या और कैसे मदद कर सकता हूं। शुभम को अपना फोन बार बार चार्ज करना पड़ता है। क्योंकि दिन में हज़ारों हज़ार कॉल्स उनके मोबाइल पर आती हैं। ऐसा इसलिए है कि 26 साल के शुभम का फोन विदेशियों के लिए की एक प्रकार से हेल्पलाइन बन गया है। कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन ने कई विदेशियों को भारत में मुसीबत में डाल दिया। ना तो वो अपने देश लौट सकते थे और ना ही कोई होटल उन्हें रखने के लिए तैयार हो रहा था। ऐसे में उत्तराखंड के शुभम उन विदेशियों के लिए मसीहा बनकर सामने आए।

मुसीबत में फंसे विदेशियों के मसीहा बने शुभम

लॉकडाउन के दौरान विदेशियों की मदद करने वाले उत्तराखंड के शुभम धर्मस्क्तू को दुनिया सलाम कर रही है। बहुत से देशों की मीडिया और एंबेसीज़ ने भी शुभम की इस सोच को सलाम किया है। वैसे तो शुभम मुन्स्यारी के रहने वाले हैं लेकिन फिलहाल उनका परिवार हलद्वानी के लाल डाट में रहता है। हल्द्वानी से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद शुभम ने अहमदाबाद में नेशनल इस्टीट्यूट ऑफ डिज़ाइनिंग से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया।

पढ़ाई पूरी करने के बाद शुभम मुंबई में रहकर डॉक्यूमेंटी मूवी बनाने लगे। शुभम अलग-अलग जनजातियों के जीवन पर एक वृत्तचित्र की शूटिंग के लिए जैसलमेर मौजूद थे। इस दौरान उन्होंने देखा कि बहुत से विदेशी कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन की स्थिति में अपना सामान लेकर इधर-उधर भटक रहे थे। उनसे सरकार ने अपने-अपने होटल छोड़ने को बोल दिया था। इस दौरान कई विदेशी ऐसे थे जिनके पास खाने को कुछ नही था। एक के बाद एक विदेशियों की हालत देखकर शुभम को एक आइडिया आया। उसने पहले सभी विदेशियों की मेडिकल जांच करवाई और उन्हें एक जगह इकठ्ठा कर लिया। 22 मार्च से ठीक एक दिन पहले उन्होंने शाम की ट्रेन पकड़ी और सभी विदेशियों को वो दिल्ली ले आए।इन विदेशियों में ज्यादातर स्पेन, चेक गणराज्य, फ्रांस से थे। शुभम का दिल्ली आने का फैसला इसलिए था क्योंकि वहां एंबेसीज़ भी मौजूद थीं और वहीं से उनके स्वदेश वापसी का रास्ता भी मिलता। जनता कर्फ्यू के घंटों के दौरान ट्रेन अगले दिन यानी रविवार सुबह 10 बजे दिल्ली पहुंची। इतने विदेशियों का जत्था लोगों की नज़रों को परेशान कर रहा था। लिहाज़ा दिल्ली स्टेशन से शुभम ने कई होटलों को फोन करना शुरु किया लेकिन विदेशियों के साथ होने की बात पता चलते ही सारे होटल मुकरने लगे। हालांकि फिर वसंतकुंज में एक हॉस्टल में रुकने का प्रबंध हो सका वो भी इसी शर्त पर कि मेडिकल जांच सर्टिफिकेट उन्हें दिखाना होगा। तब से 15 यात्रियों के साथ शुभम उसी छात्रावास डेरा डाले हुए हैं। शुभम हर विदेशी की मदद करने में जुटे हुए हैं। उन्हें खाने-पीने की ना तो कोई कमी होने देे रहे हैं और स्वदेश जाने के लिअ भी पूरी मदद करने में लगे हैं। शुभम का कहना है कि

“मैंने अपने प्रोजेक्ट के लिए जो कुछ भी बचाया था, उससे मैंने इनका सारा खर्च उठाया है और फिर अपने दोस्तों और इंस्टाग्राम पर कुछ डोनर्स से भी मदद ली। जब तक कि उन्हें अपने देशों में वापस नहीं भेंजूगा, तब तक मैं इनकी मदद करता रहूंगा।”

इस दौरान शुभम सोशल मीडिया पर लगातार एक्टिव हैं वो इसके माध्यम से ना सिर्फ विदेशियों को उनके घर से लगातार संपर्क करवा रहे हैं बल्कि क्राउड फंडिंग के ज़रिए उन्की पूरी मदद भी कर रहे हैं। कई विदेशियों ने अपनी अपनी एंबेसीज़ से संपर्क किया और शुभम के काम के बारे में बताया। एंबेसीज़ की तरफ से ना सिर्फ शुभम की तारीफ की गई बल्कि विदेशियों को मदद का आश्वासन भी मिला।

“ये समूह अब एक परिवार का हिस्सा बन गया है। ये मेरी ज़िन्दगी का अलग अनुभव रहा। ये समय मेरी लाइफ का सबसे मुश्किल और सबसे अच्छा समय है।”


शुभम ने अपना नंबर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया।जिसके बाद पूरे भारत से उन विदेशियों के फोन आने लगे, जो अलग अलग जगहों पर फंसे हुए थे। शुभम के पास मदद मांगने के लिए दिन में हज़ारों कॉल्स आने लगे। सिर्फ भारत से ही नहीं, बल्कि अब शुभम के पास उन लोगों के भी कॉल्स आने लगे हैं जो भारतीय हैं और बाहर फंसे हुए हैं। शुभम की ये सोच उन्हें सच में एक स्टार बना गई। मुसीबत में काम आए शुभम अब इन विदेशियों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं। शुभम को कई नए दोस्त मिले हैं जिनका साथ अब ताउम्र रहने वाला है। शुभम के इस सराहनीय काम के लिए हमारा सलाम।


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