नैनीताल में लड़की ने भूकंप को भी झटका देने वाले बना डाले घर!

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शानो शौकत हो, बढ़िया नौकरी हो, गाड़ी और घर भी अपना हो फिर भी दिल में सुकून ना हो ऐसा कम लोगों के साथ ही होता है। मूल रूप से बिहार की रहने वाली शगुन ने कम उम्र में ही सब कुछ हासिल किया जरूर लेकिन उनके दिल का जुनून कुछ और ही था जो उनहें चैन से जीने का साहास नहीं दे पा रहा था। लिहाजा शगुन ने वही करने की ठानी जो वो वाकई करना चाहती थी। शगुन ने जो किया उसका उदाहरण दिल्ली के वसंत कुंज की सिंधी बस्ती में देखने को मिला सकता है। शगुन ने यहां ज़रुरतमंद बच्चों के लिए एक ऐसा छोटा-सा स्कूल बनाया जो पूरी तरह से सस्टेनेबल है। ये अर्थबैग तकनीक से बना है, यानी ये स्कूल बिना सीमेंट और ईंटो के बना है। जी हां, शगुन गीली मिट्टी नाम की एक संस्था चलाती हैं जो सस्टेनेबल घरों का निर्माण करती है। इस तकनीक में बैग्स को मिट्टी से भरा जाता है और इन्हें ईंटों की तरह इमारत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह तकनीक 60 के दशक में एक ईरानी-अमेरिकन आर्किटेक्ट नादेर खलीली द्वारा ईजाद की गयी थी। यह बहुत ही कम लागत और सस्टेनेबल घर-निर्माण की तकनीक है। 38 साल की शगुन सिंह इसी तकनीक का इस्तेमाल करके, उत्तराखंड, दिल्ली और हरियाणा के कुछ भागों में आज प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल घर और अन्य ज़रुरत की इमारतें बना रही हैं।

शगुन ने 10 साल तक मल्टीनेशनल कंपनी में काम किया। लेकिन दिल में कुछ अलग करने की तमन्ना थी लिहाज़ा अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर लौट आईं अपनी जड़ों की ओर। शगुन कहती हैं कि

“सब कुछ बढ़िया था- घर, गाड़ी, जायदाद- बहुत कम समय में बहुत कुछ हासिल कर लिया था। लेकिन फिर भी एक सुकून नहीं था। हमेशा लगता था कि इतना सब कुछ किसके लिए कर रहे हैं, न साफ हवा है, न साफ पानी और न ही स्वस्थ खाना-पीना। इसलिए सोचती थी कि कुछ अलग करूंगी कभी। पर अच्छे काम का कोई शुभ मुहूर्त नहीं होता। इसलिए जब दिल में आ जाये तभी उस पर काम करना चाहिए, वरना हम कभी चीज़ों से बाहर नहीं निकल पाते हैं।”



बस इसी सोच के साथ शगुन ने अपनी नौकरी छोड़ी और बस खुद पर विश्वास किया। सबसे पहले तो उन्होंने नौकरी छोड़ने के बाद उन सब चीज़ों को सीखना शुरू किया, जो उन्हें पसंद थी। उन्होंने मार्शल आर्ट सीखा और आज बहुत जगह लड़कियों को आत्म-रक्षा के गुर भी सीखा रही हैं। इसके बाद उन्होंने आर्किटेक्चर में हाथ आज़माया। उन्होंने अलग-अलग तरह की आर्किटेक्चर वर्कशॉप लीं और जाने-माने लोगों से सस्टेनेबल घर बनाने की बहुत-सी तकनीक सीखीं। शगुन ने फैसला किया कि उन्हें शहर में नहीं रहना है और संयोग से उन्हें उत्तराखंड में नैनीताल से 14 किलोमीटर दूर पंगोत के पास एक गाँव, मेहरोरा में ज़मीन मिल गई। इसके बाद शगुन ने नैनीताल के इस गांव में अपना घर बनाने का फैसला लिया। लिहाज़ा गांव के ही किसी ना किसी परिवार के साथ वो वक्त गुजारने लगीं। अपने घर को अलग ढंग से बनाने की ललक ने स्थानीय लोगों को रोज़गार दे दिया। शगुन बताती हैं कि  वहां जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा परेशान किया वह थी कि लोग अपने पुराने प्राकृतिक रूप से बने घरों को तोड़कर ‘पक्के घर’ बनाने में लगे थे,” शगुन ने बताया। ‘पक्के घर’ का कांसेप्ट हमारे यहां सिर्फ ईंट और सीमेंट से बने घरों तक ही सीमित है जबकि पक्के घर से अभिप्राय ऐसे घर से होना चाहिए, जो कि पर्यावरण के अनुकूल हो और जिसमें प्राकृतिक आपदाओं को झेलने की ताकत हो जैसे कि बाढ़, भूकंप आदि। अर्दन तकनीक से बने घरों में ये सभी खूबियां होती हैं। शगुन बताती हैं कि नेपाल भूकंप के दौरान सिर्फ़ इस तकनीक से बने घर ही भूकंप को झेल पाए थे और गिरे नहीं थे।

इसलिए जब शगुन ने यहां इस तरह का चलन देखा तो उन्होंने इस बारे पर कुछ करने की ठानी। उन्होंने अपने घर को लोगों के लिए एक उदाहरण बनाने का फैसला किया। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करके सस्टेनेबल के साथ-साथ मॉडर्न लुक वाला घर बनाया। इस घर की चर्चा इतनी हुई कि आज दूर-दूर से लोग इसे देखने आते हैं और यहीं पर यानी नैनीताल के पंगोट में साल 2015 में नींव रखी गई ‘गीली मिट्टी’ की। शगुन के संगठन ‘गीली मिट्टी’ के दो हिस्से हैं- एक गीली मिट्टी फार्म और दूसरा गीली मिट्टी फाउंडेशन। गीली मिट्टी फार्म को शगुन ने शुरू किया है तो वहीं गीली मिट्टी फाउंडेशन में उनके सह-संस्थापक, ओशो कालिया भी शामिल हैं। शगुन गीली मिट्टी फार्म के ज़रिये वे लोगों को फिर से अपनी जड़ों और प्रकृति से जोड़ना चाहती हैं। नैनीताल के पंगोट में शगुन इसी को एक सेंटर के तौर पर विकसित कर रही हैं, जहां पर लोगों को प्राकृतिक भवन-निर्माण की तकनीक सिखाई जाएगी। साथ ही, यहां पर लोगों को सस्टेनेबल लिविंग के तरीके भी सिखाये जाएंगे जैसे कि खुद जैविक खेती करना, किचन गार्डन, खाद बनाना, सौर-ऊर्जा और वर्षा जल संचयन आदि। इसलिए शगुन ने अपने घर को लोगों के लिए एक प्रेरणा बनाया। वे बताती हैं कि मेहरोरा गाँव में मौसम की स्थिति बहुत ही ख़राब है, बहुत ठण्ड और हद से ज़्यादा बारिश, पर उनके घर को यह सब प्रभावित नहीं कर रहा। गोल आकार में बना यह घर आज यहां आकर्षण का केंद्र है और गाँव के लोगों ने इसे नाम दिया है ‘गोल घर’! यहीं पर शगुन अपनी टीम के साथ मिलकर लोगों के लिए आर्किटेक्चर तकनीक पर वर्कशॉप आयोजित करती हैं। उनकी वर्कशॉप 2 दिन से 45 दिनों तक की होती हैं। जो लोग अच्छे-खासे परिवारों से हैं और फीस दे सकते हैं, उनके लिए ये वर्कशॉप फीस के साथ होती हैं। पर कुछ ग्रामीण और गरीब लोग, जो पैसे नहीं दे सकते, उन्हें शगुन मुफ्त में सिखाती हैं। इन वर्कशॉप से मिलने वाले पैसों से वे ‘गीली मिट्टी फाउंडेशन’ के सोशल प्रोजेक्ट्स को फंड करती हैं। शगुन बताती हैं कि वे खुद पर निर्भर होकर किसी के लिए कुछ करना चाहती हैं। उनका उद्देश्य है कि अपने प्रोजेक्ट्स को सेल्फ-सस्टेनेबल बनाएं ताकि उन्हें किसी से डोनेशन मांगने की ज़रुरत न पड़े। इसके लिए, वे गाँव के लोगों को ट्रेनिंग देकर उन्हें इको-टूरिज्म और ऑर्गेनिक फार्मिंग के लिए तैयार कर रही हैं। क्योंकि अगर गाँव में ही अच्छे रोज़गार के साधन होंगे तो पलायन नहीं होगा। लोग सिर्फ चंद टूरिस्ट पैलेस देखकर लौटने की बजाय इन गांवों में आकर एक-दूसरे की संस्कृति से रू-ब-रू होंगे। 


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