एक मंदिर से शुरू हुआ ‘स्वच्छता मिशन’ बन गया उत्तराखंड की पहचान, अनोखी पहल से जुड़े सैंकड़ों लोग

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देहरादून: स्वच्छता देश के बड़े मुद्दों में से हैं। हर कोई इसकी बात करता है, सरकार को कोसता है लेकिन अपनी जिम्मेदारियों से भागता जरूर है। कुछ ना कुछ तो गलती होती है फिर कहा जाता है एक से क्या फर्क पड़ेगा…. इस एक से कई रास्ते खुलते भी हैं और बंद भी होते हैं। आज एक शुरुआत ने मिशन का रूप ले लिया है, जो गढ़लाव मंडल में लोगों को प्रेरित कर रही है।

देवली  बगड़ चमोली गांव के भुवन रावत रोजगार के लिए दिल्ली पहुंचे थे। लंबे वक्त से वह पहाड़ वापस लौट कर बदलाव के लिए काम करने के इच्छुक थे। उन्होंने साल 2017 में स्वच्छता अभियान की तर्ज पर मेरा गांव… स्वच्छ गांव… मुहिम शुरू की। उनका मानना था कि इस कार्य के लिए हमे किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अपने देश को सुंदर रखता हमारा कर्तव्य होना चाहिए। भुवन दिल्ली से गांव लौटने के बाद पौड़ी में डिप्टी मैनेजर के रूप में काम करते हैं।

कैसे हुई शुरुआत

इस मुहिम के मुख्य प्रचारक भुवन रावत ने बताया कि साल 2017 में  इस अभियान की शुरुआत मां धारी देवी के मंदिर से हुई। मंदिर में पूजा होती थी लेकिन सफाई का ध्यान नहीं दिया जाता था। कोई भी कही भी कुछ भी फेंक देता था ये देखकर पीड़ा होती थी। ऑफिस जाते वक्त उन्होंने तेल के कनस्तरों को दुकान के बाहर देखा। उन्होंने कम पैसों में उसे खरीदा। उन्होंने मंदिर परिसर को साफ सुधरा रखने की योजना बनाई। पुराने कनस्तरों को उन्होंने रंग किया और उन्हें कूड़ेदान के रूप में मंदिर परिसर की कई जगह पर रख दिया।

पहले दिन उन्हें सफलता नहीं मिली लेकिन धीरे-धीरे सभी श्रद्धालू कचरा कूड़ेदान में डालने लगे और इस मुहिम से जुड़ने लगे। इस चीजों ने हौसला बढ़ाया और उन्होंने इस मेरा गांव स्वच्छ गांव मुहिम को बड़े स्तर तक पहुंचाने का फैसला किया ताकि उत्तराखण्ड को स्वच्छता के मार्ग पर तेजी से बढ़े और उदाहारण पेश करें। उनके परिश्रम ने मां धारी देवी के परिसर को जिले की सबसे साफ जगह बना दिया। अगर भुवन द्वारा इस मुहिम को शुरू नहीं किया होता तो मंदिर के आसपास की जगह का क्या होता। हर परिवार से एक नागरिक हर महीने के पहले और तीसरे रविवार को एक निर्धारित समय पर इकट्ठा होकर पूरे गांव में स्वच्छता अभियान चलाता है।

कैसे जुड़े गांव वाले

धारी देवी की सफलता के बाद भुवन ने अपना जीवन समाज को दे दिया। वह इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए 20-25 गांव के लोगों को सफाई का महत्व और फायदे बताने लगें। 15 अगस्त 2017 में उन्होंने खुद झाड़ू उठाया और कंडारा गांव में अभियान सफाई अभियान चलाया। उन्होंने बताया कि पहाड़ों में सैलानियों द्वारा स्थानीय निवासियों से ज्यादा की जाती है। सेहत ही सब कुछ हैं और सफाई कर इसे बीमारियों से दूर रखा जा सकता है। लोगों का सहयोग भुवन को मिलने लगा और मेरा गांव… स्वच्छ गांव… मुहिम को उत्तराखण्ड में पहचान मिलने लगी।

इस मुहिम से कंडारा, देवली बगड़, खालू गांव और तोलमा गांव के लोग जुड़ने लगे। इतना ही नहीं ये अभियान भारत को अंतिम गांव माणा तक भी शोर मचाने लगा। लोगों ने स्वच्छता को अपना धर्म और कर्म मान लिया है। ग्रामीण कहते हैं कि इस अभियान से हम नया गांव देख पा रहे हैं। हमें खुशी है कि हमारी नई पीढ़ी को बदलते भारत की सुंदर तस्वीर देखने को मिलेगी। गांव वाले बड़े गर्व से बताते हैं कि यहां सफाई का काम हुआ है  और इससे यह संदेश आगे दूसरे लोगों तक जाता है।इस मुहिम के बाद गांव वालो ंको यह भरोसा तो हो गया है कि देश सेवा के लिए पैसो के अलावा और भी जरिए हैं। इस अभियान को बढ़ाने के लिए हर किसी को जिम्मेदारी दी गई है।

इस अभियान तक पहुंचाने के लिए स्कूलों में कार्यशाला होती है। कूड़ेदान स्कूलों में बंटवाए जाते हैं और उन्हें सफाई के महत्व में बताया जाता है। इसके अलावा शादियों में भी इस अभियान का प्रचार होता है। इसके अलावा कागज से बनी वस्तुओं का इस्तेमाल करने पर जोर देखर गांव को पॉलीथिन मुक्त किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। कूड़े को दोबारा कैसे इस्तेमाल किया जाए इस पर भुवन कर रहे हैं। भुवन स्कूलों के बच्चों को आर्थिक मदद भी करते हैं। इस लिस्ट में पौड़ी के 14 स्कूल हैं। भुवन का अच्छा का काम पूरे भारत में फैल रहा है।


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