पहाड़ी संस्कृति को ज़िंदा रखने के लिए दंपत्ति ने घर को बनाया म्यूज़ियम, देश-विदेश से आते हैं टूरिस्ट

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इस बात को करीब 25 साल बीत चुके हैं। एक घर कैसे पहाड़ी संस्कृति को संजो कर रखने का विख्यात संग्राहलय बन गया, इसे समझने के लिए एक प्रेरणा का होना ज़रूरी है। मसूरी का ये म्यूज़ियम आज देश विदेश में विख्यात हो चुका है। इसके पीछे अथाह मेहनत, विचार, और प्रक्रिया छुपी है। शुक्ला दंपत्ति का घर आज सोहम हेरिटेज एवं आर्ट सेंटर के नाम से जाना जाता है। यही नहीं इसी सेंटर में समाज के गरीब और वंचित तबके के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है ताकि वो अपने हक को ना सिर्फ जान सकें बल्कि उसे हासिल करने का हुनर भी सीख सकें। मसूरी से तीन किमी की दूरी पर धनोल्टी रोड पर चामुंडा पीठ मंदिर रोड स्थित बिग बैंड वाला हिसार में बने इस अद्भुत म्यूज़ियम को देखने के लिए देशी-विदेशी पर्यटकों का तांता लगा रहता है।

कहानी की शुरुआत साल 1996 से होती है। लखनऊ के समीर शुक्ला और उनकी पत्नी डॉ. कविता शुक्ला घर से दूर हिमालय की वादियों में सैर करने निकलते हैं। ये दौर ऐसा था जहां इस दंपत्ति के मष्तिष्क में कुछ नया करने का बीज बो चुका था। उत्तराखंड घूमने दौरान उन्हें पहाड़ और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत इतनी भाई कि उन्होंने अपनी आगे की ज़िन्दगी यहीं बिताने का फैसला कर लिया। इसके बाद वो उत्तराखंड की इन्हीं वादियों में अपना घर बनाने में जुट गए । शुक्ला दंपत्ति ने लखनऊ का अपना मकान बेच कर उत्तराखंड के मसूरी में रहने का फैसला किया। लेकिन आज ये एक घर से ज्यादा पहाड़ी संस्कृति को संजो कर रखने का म्यूज़ियम बन चुका है।

उत्तराखंड की संस्कृति को बचाने के लिये गिने चुने लोग ही काम कर रहे हैं। इस फेहरिस्त में इस जोड़े का नाम भी शामिल है। जहां पहाड़ की संस्कृति विलुप्त हो रही हो और ऐसे में शुक्ला दंपत्ति जैसा कोई ठोस काम करे तो इससे क्या कहा जाए। सोहम म्यूज़ियम के बदौलत इस जोड़े ने खूब सुर्खियां बटोरीं। लेकिन ये इस शक्ल तक यूं ही नहीं पहुंचा। सोहम म्यूज़ियम के लिए रिर्सच और डाटा कलेक्शन का काम 1997 में शुरु हो चुका था लेकिन इसकी औपचारिक शुरुआत 2014 में हुई। इसके माध्यम से शुक्ला दंपत्ति पहाड़ की सुंदरता और यहां की संस्कृति को लोगों तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। इस म्यूज़ियम की खास बात ये है कि इसे दो भागों में बांटा गया है। अंदर का सेटअप और बाहर का सेटअप, ये पूरा म्यूजियम आपको पहाड़ की संस्कृति और उसके इतिहास से सराबोर कर देगा।

सोहम संग्राहलय के अंदर का सेटअप

पेंटिंगः  डाॅ.कविता शुक्ला एक शानदार आर्टिस्ट हैं। उनका सीधा वास्ता हुनर की दुनिया से है। वो पेंटिंग के माध्यम से उत्तराखंड की विरासत को संजो कर रखने की अहम कड़ी हैं। इनकी पेंटिंग्स में उत्तराखंड की लोक संस्कृति, लोक जीवन, मेले कौथिग और लोक यात्राओं पर आधारित होती हैं। 

फोटोग्राफीः यहां फोटोग्राफी सेक्शन भी हैं। जहां मसूरी शहर और उत्तराखंड राज्य को आप एक बार फिर से नए अंदाज में देख सकेंगे। पुराने बाज़ार की फोटो, लैंडोर बाजार की फोटो, मसूरी की कुछ ऐसी फोटो जो आपको कहीं भी देखने को नहीं मिलेंगी, ये सब रोचक आपको यहां मिल सकता है।इसमें 1947 से पहले और अब तक के उत्तराखंड, कश्मीर, लद्दाख और तिब्बत को भी फोटोग्राफी के ज़रिये दिखाया गया है।

शिल्पकृतियां: म्यूज़ियम के इस हिस्से में आपको उत्तराखंड के पुराने साजो सज्जा के सामान, वाद्य यंत्र, पुराने समय के बर्तन जिनका मिलना अब नामुमकिन है, यह सारी चीजें यहां देखने को मिलेंगी।ये हिस्सा देखने में जितना रोचक है उतना ही जानकारियों से लैस भी।

सोहम संग्राहलय के बाहर का सेटअप

वुडक्राफ्टः इसमें आप लकड़ी के उपर कि हुई पुरानी संस्कृति के कुछ अंश देख सकते हैं।

लोक-कलाः फोल्क आर्ट के माध्यम से इस म्यूजियम की दीवारों पर आपको वह चित्रकारी देखने को मिलेंगी जो बहुस पहले उत्तराखंड के गांव के घरों में दीवारों पर बनाई जाती थी।इस म्यूज़ियम के माध्यम से समीर ने हर वो कोशिश की है जिससे वह ज्यादा से ज्यादा लोगो तक अपनी परंपरा और संस्कृति को पहुंचा सकें।

विस्तृत रूप में अगर देखें तो इस म्यूज़ियम की अदा बेहद निराली है।यहां हिमालय की बहुमूल्य जड़ी-बूटियों को भी दिखाया गया है, ताकि आज की युवा पीढ़ी इनके बारे में जान सके और इनका उत्पादन कर रोजगार-सृजन कर सके। यहीं आपको पहाड़ की टोपी के कई प्रकारों के बारे में जानकारी मिलती है। गैलरी में हिमालय, मध्य हिमालय और मैदानी इलाकों में पाए जाने वाले पक्षियों के बारे में जानकारी मिलती है। पहाड़ के लोक जीवन से जुड़ी वस्तुओं, आभूषणों, देवी-देवताओं के चित्र, पहाड़ी वाद्य यंत्रों, रिंगाल, लकड़ी के सामान, बर्तन, पहाड़ के लोक जीवन से जुड़ी चीजें और पहाड़ी टोपी को संजोकर रखा गया है। यहाँ आपको हिमालय से संबंधित दुर्लभ छाया चित्रों के अलावा खान-पान, कला-संस्कृति, तीज-त्योहार, वेश-भूषा और लोक संस्कृति के हर वह रंग देखने को मिल जाते हैं, जिन्हें अब लोग भूलते जा रहे हैं। वहीं, उनके प्रयासों से बनायी गई पहाड़ी टोपी आज लोगों की पहली पसंद बन गई है। रोज़ ही यहाँ पर्यटकों का तांता लगा रहता है। देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग इस म्यूजियम को देखने आते हैं।

खास बात ये है कि सोहम म्यूज़ियम किसी सरकारी संस्था के अंर्तगत काम ना करते हुए राज्य के भविष्य और संस्कृति के लिए काम कर रहा है।इतना कुछ करने के बाद समीर इसमें काफी कुछ और करना चाहते हैं जिसके लिए उन्होंने तैयारी शुरु कर दी है। कुछ वर्ष पहले बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा के साथ 50 हिमालयन हीरो के रूप में शुक्ला दंपत्ति का भी चयन किया गया था। 

“पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत वृहद और समृद्ध है। लेकिन इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए अभी तक ज़मीनी प्रयास नहीं हुए हैं। कोशिश की जानी चाहिए कि हिमालय की सांस्कृतिक विरासत और लोक संस्कृति को बचाने के लिए एक दीर्घकालीन कार्य योजना बनाई जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी संस्कृति के बारे में जान सके। इसके अलावा, जो लोग इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, उन्हें भी प्रोत्साहित किया जाए, ताकि वे और बेहतर तरीके से काम कर सकें।” – समीर शुक्ला, सीईओ, सोहम हेरिटेज एवं आर्ट सेंटर

चप्पे-चप्पे पर छपी है पहाड़ की दास्तां

समीर शुक्ला की पत्नी डॉ. कविता शुक्ला ड्राइंग और पेंटिंग में डॉक्टरेट हैं। सोहम म्यूजियम की सारी पेंटिंग्स डॉ कविता की ही बनाई हुई है। अब तक सैकड़ों पेंटिंग्स को वो आकार दे चुकी हैं। इनमें उत्तराखंड की लोक संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलती है। पहाड़ के लोगों की इष्ट देवी माँ नंदा देवी और नंदा राजजात यात्रा की शानदार पेंटिंग हो, चाहे कुमाऊँ की लोक संस्कृति की बानगी ऐपण और बूढ़ी दीपावली पर बनाई गई उनकी पेंटिंग उन्हें अलग पहचान दिलाती है।

म्यूज़ियम के अलावा पाठशाला भी है घर

मसूरी में घर बनाते ही डॉ कविता ने उसे एक पाठशाला में तब्दील किया और शक्ति केंद्र की नींव रखी। इस पाठशाला में वे समाज के गरीब व वंचित बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान कर उनके जीवन में रौशनी बिखेरी जाती है। अभी तक 400 से अधिक विद्यार्थी यहाँ से शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। यहाँ से शिक्षा ग्रहण कर चुके कई बच्चे आज खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।

समीर कहते हैं कि ”सोहम म्यूज़िम केवल आर्ट दिखाने का माध्यम नहीं है, बल्कि अलग-अलग शहरों से लोग यहां आकर रिर्सच और इसके बारे में पढ़ाई भी करते हैं। सोहम म्यूजियम ना केवल एक म्यूजिम है बल्कि लोगों के बीच यह एक ऐसी संस्था हैं जिसपर लोग पढ़ाई करते हैं और इतिहास के पन्नों को दोबारा दोहराते हैं”।

शुक्ला दंपत्ति का पहाड़ से लगाव उन्हें इस मुकाम तक ले आया। आज ये संग्राहलय देश-दुनिया में अपनी छाप छोड़ चुका है।इस म्यूज़ियम में आपको बहुत सी ऐसी चीजें मिलेंगी जो लगभग विलुप्त होने की कगार पर हैं। अलग-अलग जगहों से जब पर्यटक घूम कर यहां पहुंचते हैं तो उनके लिए यह एक अलग ही अनुभव होता है।ना केवल पहाड़ के लोग बल्कि टूरिस्ट भी इन चीजों से जुड़ाव महसूस करते हैं। वाकई शुक्ला दंपत्ति की इस सोच ने उत्तराखंड को वो दिया है जिसकी उसे सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। पहाड़ की संस्कृति को संजो कर रखने और उसे देश दुनिया तक पहुंचाने के लिए समीर शुक्ला और उनकी पत्नी डॉ. कविता शुक्ला को दिल से सलाम।


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