रघुवर मुरारी: PHD की पढ़ाई छोड़कर चंपावत लौटे, खेती की और कमाई लाखों में

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उत्तराखंड में अक्सर हमें सुनने को मिलता है कि संसाधनों के कम होने की वजह से हम पीछे रह गए। हम रोजगार के लिए तरस रहे हैं और इसलिए पलायन करना पड़ा। यह बातें कुछ हद तक सही भी हैं लेकिन एक उदाहरण पेश करने के लिए आपकी कीमत चुकानी होती है, यानी राज्य में रहकर स्वरोजगार के द्वार खोलना। जो लोग ऐसा करने में कामयाब हुए हैं, उन्हें यूके स्टोरिज़ न्यूज पोर्टल सलाम करता है। शायद उनकी के परिश्रम की बदौलत ही उत्तराखंड स्टार्टअप हब बनने की ओर बढ़ रहा है। हम आपके सामने कई ऐसी स्टोरी ला चुके हैं, जहां केवल मिट्टी के प्यार ने व्यक्ति को शहर से छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। उसने अपनी मिट्टी को रोटी रोजी का जरिया बना दिया। इसी क्रम में आप हम बात करेंगे रघुवर मुरारी जो रहने वाले हैं चंपावत जिले में भेटी गांव के….

रघुवर मुरारी ने जैविक खेती के क्षेत्र में इतना शानदार काम किया कि वह आज इसके बदौलत लाखों रुपए कमा रहे हैं। पॉलीहाउस और मल्चिंग विधी से खेती उन्हे अच्छा रिस्पांस दे रही है और पैदा होने वाली वस्तुओं की खपत लोकल बाजार में ही हो रही है। ऐसा नहीं है कि रघुवर मुरारी स्कूल ना गए हो या फिर कम शिक्षित हो। वर्ष 2000 में उन्होंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से एमए की शिक्षा प्राप्त की। कुछ वक्त बाद उन्होंने पीएचडी की तैयारी की लेकिन मन में अपने पहाड़ में कुछ करना इरादा उनके दिल और दिमाख में चढ़कर बोल रहा था और हर कामयाब शख्स की तरह उन्होंने तैयारी को पीछा छोड़ लोहाघाट का रुख किया। पढ़े- लिखें के हाथ में फावड़ा और कुदाल देखलकर लोग क्या कहेंगे इस बारे में उन्होंने बिल्कुल नहीं सोचा और भेटी कर्णकरायत लोहाघाट गांव में 40 से अधिक नाली में आलू की खेती शुरू की।

परिश्रम को फल मिलने लगा तो उन्होंने जैविक खेती के क्षेत्र में जानकारी एकत्र करना शुरू कर दिया। कृषि विज्ञान केंद्र लोहाघाट के सहयोग से उन्होंने जैविक आलू, पत्ता गोभी, फूल गोभी, बैगन, टमाटर, शिमला मिर्च, ब्रोकली, चुकंदर, गाजर, खीरा, ककड़ी, लौकी, धान, मढुंवा, गेहूं आदि का उत्पादन करना शुरू कर दिया। इसके अलावा डेयरी और मछली पालन  स्टार्टअप खोल पाए हैं।

रघुवर मुरारी की मानें तो पहाड़ में रहकर भी अच्छे तरीके से काम हो सकता है। हम खुद भी कमा सकते हैं और दूसरे लोगों के लिए रोजगार के द्वार खोल सकते हैं। जैविक खेती से जुड़े स्टार्टअप के बारे में उनसे कोई जानकारी लेता है तो वह निसंकोच जानकारी देते हैं। वह उनकी सहायता करने के लिए हर पल तैयार हैं। उनकी मेहनत का नतीजा यह निकला कि आज वह प्रति सीजन एक से डेढ़ लाख रुपये की सब्जियां बेच रहे हैं। सिंचाई के लिए बरसाती पानी का संग्रह किया फिर उससे फसलों की सिंचाई के उपयोग में लाए। उन्होंने बताया यदि पलायन रोकना है तो खुद ही पहल करनी होगी। वह अन्य लोगों को भी आधुनिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। बता दें कि मुरारी सुबह 5 बजे उठकर परिवार दिनचर्या शुरू करते हैं। वह अपना ज्यादातर उत्पाद लोहाघाट में ही बेचते हैं। रघुवर की कोशिश है कि वह अपने काम से लॉकडाउन के चलते घर लौटे प्रवासियों को प्रेरित कर सके।


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