पहाड़ के इस शिक्षक ने अपनी थ्योरी से बदल डाली सरकारी स्कूल की परिभाषा, मिला अवॉर्ड

710
Share Now

उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों की हालत कौन नहीं जानता, ऊपर से दुर्गम स्थानों के स्कूल तो माशाल्लाह हैं। कहीं भवन जर्जर हैं, तो कहीं शिक्षक नहीं, कहीं ये दोनों हैं तो बच्चे नहीं। वास्तविकता तो ये है कि दुर्गम स्थानों के स्कूलों में शिक्षक जाने से बचता है वो पहाड़ों पर टिकने के बजाए मैदानी स्कूलों में नौकरी करना ज्यादा पसंद करता है। लेकिन इन्हीं हालातों से लोहा लेने के लिए कुछ शिक्षक जागरुक हैं। जो ऐसे दुर्गम स्थानों के स्कूलों में बदहाल शिक्षा की तस्वीर बदलने में अपनी ताकत झोंक रहे हैं। भास्कर जोशी ऐसे ही एक मेहनतकश शिक्षक हैं जिन्होंने दुर्गम स्थान के स्कूल को खुद चुना और अपनी थ्योरी से उस सरकारी स्कूल की कायापलट कर दी। उनके इस उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें केन्द्र सरकार ने नवाचारी अवॉर्ड से सम्मानित भी किया।

अपनी मेहनत से पलट दी स्कूल की काया

भास्कर जोशी जैसे शिक्षकों में ही पहाड़ के भविष्य की उम्मीद दिखाई देती है। भास्कर जोशी अल्मोड़ा के राजकीय प्राइमरी स्कूल बजेला में पोस्टे हैं। पहले ही दिन से भास्कर ने इस स्कूल को अपनी थ्योरी से बदल डालने की कसम खा रखी है। और देखते ही देखते ये मामूली सा दिखने वाला प्राइमरी स्कूल आज किसी मॉर्डन स्कूल से कम नहीं लगता। भास्कर जोशी की मेहनत का अंदाज़ा इसी बात से लगाइए कि उन्होंने इस स्कूल की तस्वीर बदलने के लिए दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने इस स्कूल की बेहतरी के लिए मॉडल तैयार किए ताकि वो उन्ही मॉडल को धीरे-धीरे लागू कर इस स्कूल की किस्मत चमका सकें। भास्कर की मेहनत का रंग बहुत जल्द ही दिखने लगा। आज बजेला गांव के इस स्कूल में स्मार्ट क्लास है, कंप्यूटर्स है, खेलकूद का सामान, प्रोजेक्टर पर पढ़ाने की व्यवस्था और शुद्ध पेयजल की उपलब्धता भी है। स्कूल की तस्वीर बदलते ही बच्चों की संख्या भी बढ़ने लगी। गांव का हर बच्चा इतनी सुविधाएं देख कर स्कूल जाने के लिए प्रेरित होने लगा।स्कूल की कायापलट ने खूब सुर्खियां बटोरीं और शिक्षक भास्कर जोशी की सोच को कई सलाम मिलने लगे। यही नहीं भास्कर जोशी ने गांव की शिक्षित बेटियों को रोजगार भी दिया है। ये बेटियां गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं। जिन्हें डेढ़-डेढ़ हजार रुपये मानदेय भी दिया जाता है।

बच्चों की पढ़ाई के लिए बनाते हैं खास रणनीति

भास्कर का शौक है कि बच्चों का संपूर्ण विकास हो जिसमें ज्ञान कूट-कूट कर भरा हो। इसके लिए वो दिन रात बच्चों के लिए पढ़ाई की रणनीतियां तैयार करते हैं। ताकि बच्चों का मन पढ़ाई में लगा रहे। उन्हें खेल-खेल में पढ़ाई के गुण सिखाए जा सकें। उन्हें इतना एडवांस बनाया जा सके कि वो किसी भी सूरत में मॉर्डन स्कूलों के बच्चों से कम ना लगें। लिहाज़ा इसके लिए भास्कर बच्चों के लिए खुद कोर्स तैयार करते हैं।पाठ्यक्रम को अलग-अलग श्रेणियों में बांट कर उन्हें आसान करने का काम करते हैं। बच्चों को खेल-खेल में विज्ञान और दूसरे मुश्किल लगने वाले स्लैबस की पढ़ाई कराई जाती है। भास्कर बच्चों में प्रकृति प्रेम और कलात्मक अभिरुचियों को प्रोत्साहित करते हैं। उन्होंने बच्चों के पाठ्यक्रम को अलग-अलग श्रेणियों में सूचीबद्ध कर रखा है, मसलन, भाषा दिवस, प्रतिभा दिवस, नो बैग डे, बाल विज्ञान उद्यान दिवस, हरित कदम दिवस, नशा-मुक्ति अभियान दिवस, सामुदायिक सहभागिता दिवस आदि। प्रतिभा के विकास के लिए उनसे कहानियां और कविताएं लिखवाई जाती हैं। अब स्कूल के बच्चे टॉफ़ी के रेपर, पॉलीथिन इकट्ठे कर गुलदस्ते बनाते हैं, पौध रोपण करते हैं, अपना किचन गार्डन सजाते हैं।अब भास्कर कोशिश कर रहे हैं कि स्कूल को कुछ इस तरह डेवलप किया जाए कि यहां पढ़े-लिखे बेरोजगार युवा भी कंप्यूटर की ट्रेनिंग ले सकें।

आसान नहीं था यहां तक पहुंचना

भास्कर की सोच यहीं तक सीमित नहीं हैं। वो गांव-गांव जाकर बच्चों और उनके पेरेन्ट्स को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते हैं। उन्हें स्कूल में एडमिशन लेने के लिए जागरुक करते हैं वो इसलिए कि गांव का कोई बच्चा अशिक्षित ना रह जाए। यही वजह है कि वो बच्चों के साथ बच्चे बनकर उनकी पढ़ाई करवाते हैं और सबसे फेवरेट शिक्षक बन बैठे हैं। लेकिन इसके पीछे की कहानी बिल्कुल उलट है। भास्कर ने कैसे यहां तक का सफर तय किया वो अगर आप जानेंगे तो हैरान रह जाएंगे। वाकई इस स्कूल को ऐसे सुखद हाल में पहुंचाने में जोशी को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। शुरुआती दिनो में उनको बजेला गाँव के हर घर पर दस्तक देनी पड़ी। गांव वालों के ताने-उलाहने झेलने पड़े। कई अभिभावक तो अपनी आंचलिक भाषा-बोली में उनको गालियां देने से भी बाज नहीं आए लेकिन वह अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए उन स्थितियों से कत्तई विचलित नहीं हुए। हां, ये बात उन्हे जरूर तकलीफ़ पहुंचाती थी कि वे अभिभावक किसी शरारत वश नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी में अपने बच्चों को बकरियां चराने भेज देते हैं ताकि चार पैसे की कमाई हो सके। इस तरह उनका एक लंबा वक़्त अपने स्कूल के बच्चों के माता-पिताओं को समझाने-बुझाने में बीता। उसके बाद धीरे-धीरे पशुओं को चराना छोड़छाड़ कर बच्चे नियमित रूप से स्कूल आने लगे।

गांव में शुरू की ई-लर्निंग क्लासेस

कोरोना वायरस के चलते देश में लॉकडाउन लागू हुआ तब भी भास्कर खाली नहीं बैठे। घर पर बच्चों के रहते हुए उनकी पढ़ाई का क्रम ना टूटे इसके लिए उन्होंने ई-लर्निंग का कोर्स डिज़ाइन कर व्हाटसऐप ग्रुप पर बच्चों को पढ़ाना शुरु कर दिया। इस ग्रुप में छात्रों ने भास्कर से जुड़कर प्रतिदिन हाथ से लिखे नोट्स, कुछ वीडियो लिंक्स, पाठ्यक्रम से संबंधित वीडियो, प्रश्न और उनके उत्तर, एनसीईआरटी की पुस्तिकाओं की पीडीेएफ के ज़रिए अपनी पढ़ाई पूरी की।यहां भी भास्कर के सामने एक चैलेंज आया कि उनके विद्यालय के लगभग आधी संख्या में बच्चों के पास वाट्सएप वाले फोन नहीं थे, लिहाज़ा सामान्य फोन वाले बच्चों की जिज्ञासाओं के जवाब उन्होंने फोन पर देने शुरु कर दिए।

दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र अल्मोड़ा के एक गांव में मामूली से प्राइमरी स्कूल को अपनी कठिन तपस्या से देश की सुर्खियों में ला चुके भास्कर जोशी उत्तराखंड की एक ऐसी प्रेरक हस्ती बन चुके हैं, जिनसे कई दूसरे शिक्षक भी शिक्षा ले सकते हैं। अगर पहाड़ के हर गांव में भास्कर जोशी जैसा शिक्षक मौजूद होगा तो ना तो सरकारी स्कूल बदहाली का दंश झेलेंगे और ना ही स्कूलों में ताले लटकाने की नौबत नहीं आएगी।


Share Now