विदेशी नौकरी छोड़ पहाड़ वापस लौटे हरीश और अजय, बदल दी महिलाओं की जिंदगी !

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देहरादून: पहाड़ जिसका नाम सुनते ही हरियाली और स्वच्छ वातावरण याद आता है। उत्तराखंड भी इस श्रेणी में खास जगह बनाए हुए है। ना जाने ये राज्य हर साल लाखों सैलानियों को अपना बनाता है लेकिन यह अपनों से दूर है। पिछले 15 सालों से पहाड़ इस दर्द से जूझ रहा है। दर्द का नाम है पलायन। जो घर पहाड़ों की शान होते थे, वह अब खाली पड़े हैं। जिस मिट्टी में बचपन बिता था उसकी खूशबू केवल यादों में रह गई है। लोग घरों से शहर की ओर बढ़े तो जानवरों ने पहाड़ी इलाकों को अपना घर बना लिया, आलम ये है कि जानवर अधिकतर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं और लोगों को पलायन करने का बहाना मिल जाता है। रोजगार ना होने के चलते पहाड़ पलायन की चपेट में आए लेकिन अब यही पहाड़ रोजगार पैदा करने की पहली पसंद बनकर सामने आ रहे हैं। पिछले कई सालों में ना जाने कितने स्टार्टअप पहाड़ों में खुल गए हैं। ये ना सिर्फ सैलानियों को सर्विस दे रहे हैं बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं। इसी सोच के साथ हरीश और अजय ने विदेश की नौकरी छोड़ी और पहाड़ की सेवा करने का फैसला किया।

बात पौड़ी से करीब 16 किमी दूर जामलाखाल गांव की है, जहां दोनों भाइयों ने ऑर्गेनिक खेती का बोया और रोजगार के रूप में फसल भी पैदा की। दोनों भाइयों की मदद के लिए गांव की महिलाए आगें आई और आर्गेनिक खेती शुरू की। दोनों के पास विदेश में अच्छी नौकरी थी लेकिन पलायन का दर्द जवाब दे गया और वो वापस आ गए। गांव की महिलाओं ने बेटों के इस कदम से प्रेरणा ली और तस्वीर बदलने की मुहिम का हिस्सा बन गई।

दोनों ने साल 2009 में गांव छोड़ा था और 2019 में वापस आए। गांव के एक समूह को अपने साथ छोड़ाढाई एकड़ में ऑर्गेनिक खेती शुरू की। हरीश कहते हैं कि कुछ जमीन हमारे पास थी और कुछ गांव वालों ने दी। इस पर सब्जियों का उत्पादन किया। एक पॉली हाउस भी लगाया। समूह में छह महिलाएं काम करती है। जरूरत होती है तो अन्य महिलाओं को भी बुला लेते हैं। लगभग 35 महिलाएं समय-समय पर इस काम में लगी हुई है। खेती तो पहाड़ों में दशकों से होती है लेकिन अब उसे बदलने की जरूरत है। इस सोच को गांव वालों को दिमाख में भी डालना था। इसके लिए गई गांव का दौरा किया। खेती की लाइनिंग विधि से गुड़ाई-निराई शुरू की। खाद में नीम का तेल और गोबर का उपयोग करना शुरू किया।

अगर किसी काम में कोई सोच हो तो समाज को वो अपनी ओर खींच लेती है। दोनों भाइयों को साथ भी ऐसा ही हुआ। आर्गेनिक खेती के बारे में स्थानीय लोग जानने लगे। स्कूल के टीचर्स रूचि लेने लगे। इस बारे में वह अपने विद्यार्थियों को भी बताने लगे। अपने स्कूल के बच्चों के लिए सब्जियां भी हरीश और अजय के खेतों से जाने लगी। इस साहस ने पड़िया गांव के युवाओं को प्रेरित किया। वह भी बाहर से काम छोड़कर आए और गांव में आर्गेनिक खेती शुरू की। अजय बताते हैं कि इस काम ने महिलाओं को आत्मनिर्भर रहना सिखा दिया है। गांव की महिलाएं पुरुषों से अधिक कमा रही हैं। अपने बच्चों को पढ़ा रही हैं। रोजगार के चलते करीब 20 परिवार गांव छोड़ गए। करीब 90 घर बचे हैं। सभी में महिलाएं सक्रिय हैं। हिमाचल से बीज लाते हैं। सरकार से थोड़ी बहुत ही मदद मिली। गांव के प्राइमरी व जूनियर हाईस्कूल में हमारी सब्जियां जाती हैं। श्रीनगर में भी भेजी जाती हैं। अजय कहते हैं, अभी हमें साल भर में 70.80 हजार का मुनाफा होता है। हम महिलाओं को 180 रुपये की मजदूरी दे पाते हैं। हमारी सब्जियां बाजार के दामों पर ही बिकती हैं। अगर इनके दाम थोड़ा बढ़कर मिलें तो ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही महिलाओं को ज्यादा पैसे भी दे पाएंगे।

इस बारे में गांव की महिलाएं कहती हैं कि पहले खेतीबाड़ी करते थे तो जंगली जानवर उजाड़ देते थे। उसके बाद नर्सरी लगाई। इससे रोजगार मिला और हमारा खर्चा चल जाता है। स्थानीय लोग कहते हैं कि जंगली जानवरों की वजह से अपनी खेती नहीं कर पाते थे। एक महिला का कहना था कि यह काम ज्ञान भी देता है। पति बाहर नौकरी करते हैं और वह गांव में। वह साल में 100 दिन मनरेगा में काम करतीहैं। उसके बाद ऑर्गेनिक खेती।

दोनों भाइयों ने केवल अपने गांव के लिए काम नहीं किया। उन्होंने जसपुर गांव में भी नर्सरी खोली है। वहां तीन एकड़ में दाल और सब्जी उगाते हैं। जसपुर के निकट स्थित गांव बौसाले की महिलाओं के समूह जय धारी देवी को अपने साथ जोड़ा। वहां के लोग देहरादून और विदेशों में बसे हैं। उनसे बात कर हमने खेती शुरू की। इसका प्रभाव ये हुआ कि बाहर बसे लोग अपना गांव देखने आए। उन्होंने वोटर लिस्ट में अपना नाम लिखवाया ताकि गांव चलता रहे।


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