उत्तराखंड की कला, क्राफ्ट और पहाड़ी व्यंजन को मिली नई पहचान, दो सहेलियों की सोच ने किया कमाल

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उत्तराखंड में ‘भुली’ शब्द कौन नहीं जानता। यहां का हर घर इस ‘भुली’  शब्द से अच्छी तरह वाकिफ है। इसका मतलब होता है छोटी बहन। इसी शब्द को एक नई पहचान देने का काम किया है देहरादून में रहने वाली दो सहेलियों ने। तान्या सिंह और तान्या कोटनाला, इन दोनों ने ही अपनी सोच और कला से उत्तराखंड की पारंपरिक चीज़ों की नई परिभाषा गढ़ी है। ये दोनों सहेलियां मिलकर सरकार की ओर से चलाई जा रही योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिये ‘भुली’  नाम से प्रोजेक्ट चला रही हैं। 2017 में इन दोनों ने अपनी सोच को कला के ज़रिए सबके सामने रखा और देखते ही देखते भुली आर्ट ने सबके दिल में अपनी जगह बना ली।

तान्या सिंह और तान्या कोटनाला स्थानीय संस्कृति और पहनावे को ध्यान में रखते हुए महिलाओं को स्तनपान के प्रति जागरूक करने का काम रही हैं तो पहाड़ी खानों को सीमित दायरे से बाहर निकाल लोगों को उनकी खासियत भी बता रही हैं। इसके अलावा ये सहेलियां ‘स्पेस भूली’ नाम से पोस्टर और कार्ड वाली सफल महिलाओं की सीरीज चला रही हैं, ताकि इलाके की दूसरी महिलाएं उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ सकें।

तान्या सिंह एक न्यूट्रिशनिस्ट हैं और तान्या कोटनाला आर्टिस्ट। तान्या कोटनाला ने अपना ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय के साथ देश के उत्तर पूर्वी राज्यों में काम करना शुरू किया। सिक्किम, मिजोरम और असम में काम करने के दौरान उन्होने टेक्सटाइल से जुड़े काम पर ना केवल रिसर्च की बल्कि उनके विकास के लिये काफी काम किया। इसके लिये पहले वो स्थानीय कला को लेकर पेपर पर स्केच बनाती थीं और बाद में पोशाकों के डिजाइन में उनका इस्तेमाल होता था। साथ ही स्थानीय आर्ट फॉर्म का डॉक्यूमेंटेशन भी किया जाता था। वहां का प्रोजक्ट खत्म होने के बाद तान्या कोटनाला वापस अपने शहर देहरादून आ गई। यहां पर वो अपनी पारिवारिक दोस्त तान्या सिंह से मिली। जो उस समय उत्तराखंड सरकार के साथ मिलकर स्तनपान के प्रोजेक्ट पर काम कर रही थीं। इससे पहले तान्या सिंह  पटना में न्यूट्रिशनिस्ट के रूप में यूनिसेफ के लिए काम काम कर चुकी थीं।

जब उत्तराखंड सरकार  ने स्थानीय महिलाओं को स्तनपान के प्रति जागरूकता अभियान शुरू करने का फैसला लिया तो तान्या सिंह भी उस मुहिम के साथ जुड़ गई। इस बीच पोस्टर डिजाइन करने के लिए एक आर्टिस्ट की जरूरत थी। जिससे सरकार असरदार तरीके से अपनी बात लोगों तक पहुंचा सके। तब तान्या सिंह ने अपनी दोस्त तान्या कोटनाला  से इस बारे में बात की तो वो भी इस प्रोजेक्ट के साथ जुड़ने के लिये तैयार हो गई। तान्या सिंह ने ‘बताया कि

इसके बाद दोनों सहेलियों ने तय किया कि वो अपने काम को ‘भुली’  नाम से शुरू करेंगी। ‘भुली’ नाम के इस प्रोजेक्ट में स्थानीय पहनावा और रीति रिवाजों को शामिल किया गया। जिससे लोग अपने को जोड़ सकें। आज स्तनपान से जुड़ा ‘भुली’ प्रोजेक्ट उत्तराखंड  के 19 हजार आंगनवाड़ी में में चल रहा है। इस साल 1 से 7 अगस्त तक ‘विश्व स्तनपान दिवस’  के मौके पर विभिन्न आंगनवाड़ियों में इन पोस्टर के जरिये महिलाओं को बताया गया कि उनके बच्चों के लिये स्तनपान कितना जरूरी है। इन पोस्टरों में उन्होने महिलाओं को बताया कि बच्चे के जन्म के तुरंत बाद मां के दुध में काफी पौष्टिक तत्व होते हैं जो बच्चे को कई बीमारियों से दूर रखते हैं।

प्रोजेक्ट ‘भुली’  महिलाओं को जागरूक करने के अलावा पहाड़ी खानपान से जुड़ी जानकारियों को इकट्ठा करने का काम भी करता है। अब तक पहाड़ी खाने से जुड़ी जानकारियां कहीं भी लिपिबद्ध नहीं हैं क्योंकि पलायन के कारण आज की युवा पीढ़ी शहरों की ओर चली गयी है। इस वजह से ज्यादातर लोगों इस बात से अंजान हैं कि उनका मूल खानपान क्या था। ‘भुली’ प्रोजेक्ट से आज की पीढ़ी को ना केवल पहाड़ी खाने की पौष्टिकता के बारे मे बताया जाता है बल्कि उसे कैसे तैयार किया जाता है इसे भी बताया जाता है। 

तान्या सिंह के मुताबिक हमने लोगों को पहाड़ी अनाज झुंगरे, मडुवा, भट्ट, गोहत, चौलाई, लुंगडी और फलों में चकोतरा और फूल में बुरांस के इस्तेमाल के बारे में बताया। हमने उनको बताया कि किसी भी जगह का खानपान वहां के लोगों की जरूरत के मुताबिक ही होता है। इसलिए पुराने वक्त में लोग उनका सेवन करने के कारण ज्यादा स्वस्थ्य रहते थे।

प्रोजेक्ट ‘भुली’  को फिलहाल दोनों सहेलियां अकेले चला रही हैं। प्रोजेक्ट के दौरान कुछ लोग वालंटियर के तौर पर उनके साथ जुड़ जाते हैं। इस प्रोजेक्ट में दोनों सहेलिया सामाजिक मुद्दों पर खास जोर देती हैं। फिर चाहे वो स्तनपान से जुड़ा जागरूकता अभियान हो या फिर पौष्टिक खाने का अभियान। हर अभियान में वो अपनी कला के जरिये लोगों को संदेश देने की कोशिश करती हैं।

प्रोजेक्ट ‘भुली’  के अलावा दोनों दोस्तों ने ‘स्पेस भूली’  नाम से पोस्टर और कार्ड से जुड़ी सीरिज शुरू की है। इसके जरिये उत्तराखंड की सफल महिलाओं की कहानियों और वहां के पहनावे को पोस्टर, कैलेंडर और कार्ड में बताया जाता है। इसके बाद महिलाओं के स्वंय सहायता समूह के साथ मिलकर वर्कशॉप आयोजित की जाती हैं। जहां पर ऐसी सफल महिलाओं की कहानी इन पोस्टर और कार्ड के जरिये सुनाई और बताई जाती है। इस दौरान महिलाओं को बताया जाता है कि कैसे वो आगे आकर अपनी बात रख सकती हैं। अगर उनके साथ कहीं भेदभाव और अन्याय हो रहा है तो उनको इसके खिलाफ कहां आवाज उठानी चाहिए। फिलहाल इस सीरिज में तीन पोस्टर निकाले गये हैं। एक में महिलाओं को खेती करते हुए दिखाया गया है। दूसरे में बच्चे को स्तनपान करते हुए दिखाया गया है और तीसरे में महिला को ऑफिस और कैंटीन चलाते हुए दिखाया गया है। भुली आर्ट आज ग्लोबली पहचान हासिल कर रही है। इन दोनों सहेलियों की मेहनत रंग ला रही है। इन दोनों ने ही अपने काम और अपनी सोच से खूब सुर्खियां बटोरी हैं। आज इनके बनाई हुई आर्ट फॉर्म को बड़ा मार्केट मिल रहा है। उत्तराखंड की संस्कृति और महिला सशक्तिकरण को दर्शाती हुई इनकी कला ने बाज़ार हासिल किया है और यही इन दोनों सहेलियों की कामयाबी की पहली सीढ़ी है। ‘भुली आर्ट’ अपने पैर पसार रही है। इन दोनों ही तान्या सहेलियों की सोच, मेहनत और कामयाबी को हमारा सलाम। 


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