Uttarakhand के पहाड़ों पर दो बहनों का कमाल, दुनिया को दिया Organic खेती और Village Resort का नायाब तोहफा

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नैनीताल: जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए कही से निकलना पड़ता है। ये कहावत काफी पुरानी है। शहर में करियर बनाने के लिए कई लोग अपना मूल निवास छोड़ देते हैं। नौकरी करते तो हैं लेकिन गांव के सुकून को भी याद करते हैं। शहर का वातावरण उन्हें रास नहीं आता है लेकिन रोजी के लिए उन्हें समझौता करना पड़ता है। ऐसा ही कुछ नैनीताल जिले की रहने वाली कनिका और कुशिका के साथ हुआ। दोनों के बास लाखों की नौकरी थी। माता-पिता से दूर रहने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी । दोनों ने नौकरी छोड़कर गांव वापस जाने और ऑर्गेनिक खेती-बाड़ी का फैसला किया। दोनों मुक्तेश्वर में काम कर रहे हैं। इस फैसले के पीछे युवाओं को पहाड़ में स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना था। उनका कहा है कि इस तरह से पहाड़ पलायन से मुकाबला कर पाएंगे।

पलायन के ये आंकड़े डराते हैं

उत्तराखंड से पिछले एक दशक में पांच लाख दो हजार 707 लोग पलायन कर गए हैं। इनमें एक लाख 18 हजार 981 लोग स्थायी रूप से घरबार छोड़ चुके हैं। रिपोर्ट में पलायन की सबसे बड़ी वजह रोजगार के संसाधनों और आजीविका का अभाव बताया गया है। वर्ष 2011 की जनगणना के बाद प्रदेश में 734 राजस्व गांव गैर आबाद हो गए हैं, जिन्हें अब ‘घोस्ट विलेज’ कहा जा रहा है। 565 राजस्व गांव व तोक में वर्ष 2011 के बाद 50 फीसदी आबादी पलायन कर चुकी है, जिनमें छह गांव अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास हैं। राज्य में पलायन की दर 36.2 फीसदी है, जबकि हिमाचल में 36.1 फीसदी लोग पलायन कर रहे हैं। सिक्किम में यह 34.6 प्रतिशत और जम्मू-कश्मीर में 17.8 फीसदी हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदेश में सबसे अधिक पलायन युवाओं ने किया है। पिछले 10 साल में 26 से 35 वर्ष आयु वर्ग के 42 फीसदी युवा पहाड़ों से पलायन कर चुके हैं। 35 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में 29 फीसदी ने और 25 वर्ष से कम आयु वर्ग में 28 फीसदी युवाओं ने पलायन किया है।

दोनों बहनों का करियर

दोनों बहनों की स्कूली पढ़ाई नैनीताल और रानीखेत में हुई। इसके बाद एक बहन एमबीए करके गुड़गांव में जॉब करने लगी। जबकि दूसरी बहन कनिका शर्मा दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से मास्टर्स किया। दोनों के पास अच्छी सैलरी थी लेकिन मन पहाड़ में था। मुक्तेश्वर वापस लौटी और दयो-द ऑर्गेनिक विलेज रिसॉर्ट चलाना शुरू किया। ये बिल्कुल भी आसान नहीं था। उन्होंने योजना बनाई कि वह अपने काम को युवाओं तक पहुंचाएंगे। ग्रामीणों को इसके फायदे के बारे में बताएंगे ताकि ये चैन बड़ी होती रहेगी। गांव में जैविक खेती के बारे में किसी को पता नहीं था। कनिका और कुशिका ने जैविक खेती और जीरो बजट की खेती कैसे की जाती है। इसकी ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग के लिए दोनों बहने दक्षिण भारत के कई राज्यों में भ्रमण किया। इसके बाद साल 2014 में मुक्तेश्वर में 25 एकड़ जमीन पर खेती शुरू की। 

आसानी से कुछ नहीं मिलता लेकिन अच्छी सोच काम कर देती है

पहाड़ के लोगों को पलायन से रोकना और उन्हें रोजगार देने का काम बिल्कुल आसान नहीं था। ‘दयो – द ओर्गानिक विलेज रिसॉर्ट’ को पांच कमरों का करने में दो साल लगें। इस रिसॉर्ट में सिर्फ 5 कमरे बनाए गए हैं। इन कमरों को संस्कृत में प्रकृति के पांच तत्वों के नाम दिये गए हैं। ये नाम उर्वी, इरा, विहा, अर्क और व्योमन हैं। इरादा नेक था सभी को दोनों काम दिखने लगा। छु्ट्टियों में पहाड़ लोग सैर के लिए आतें हैं। सैलानियों में सुविधा देने के लिए उन्हें गांव के लोगों को ट्रेनिंग दी। इसे रोजगार के अवसर पैदा होने लगें। खेली पहला और फिर  हॉस्पिटैलिटी दो क्षेत्र में गांव के लोगों के लिए रोजगार के द्वार खुलने लगें। खेतों में सभी प्रकार की सब्जियां रहती हैं। सैलानी खुद खेत से सब्जियों को लेते हैं और खुद ही पकाते हैं। वह अपने खुद के अतिथि हैं। दोनों बहनों का ये आइडिया चल पड़ा और दूर-दूर से लोग उनके रिजॉर्ट में पहुंचने लगें। इस समय उनके रिसॉर्ट में लगभग दो दर्जन कर्मचारी कार्यरत हैं। इसके साथ ही दोनों बहनें अपने आसपास के लोगों को भी जैविक खेती के लिए जागरूक करने लगीं। साथ ही अपने कृषि उत्पाद बेचने की सप्लाई चेन भी बनाने लगीं। अब उनके कृषि उत्पाद मंडियों तक पहुंचने लगे हैं। इसके अलावा दोनों स्कूल पढ़ने वाले बच्चों को भी शिक्षा दे रहे हैं।

सरकार की नजर में आया काम

अच्छा काम ज्यादा दिन सुर्खियों से दूर नहीं रहता है। दोनों बहनों के काम ने पूरे राज्य को अपनी ओर खींचा। राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत कुशिका शर्मा को ऑर्गेनिक खेती में महारत के लिए सम्मान से नवाजा। दोनों बहनों अपने काम के लिए पहचाने जाने लगी हैं। उनका काम पूरे राज्य के युवाओं को प्रेरित कर रहा हैं। हम अपने लिए अच्छा करेंगे तो वो दूसरों को भी फायदा देगा। दोनों अपने काम से पूरे राज्य में रोजगार के अवसर खोजने का संदेश युवाओं को दे रहे हैं ताकि ये उत्तराखण्ड पलायन की बीमारी से निजात पा सकें।


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