वीरान पड़े पारंपरिक घरों को लोकप्रिय बनाने में जुटे दो युवा, सैलानियों का फेवरेट बना ‘पहाड़ी हाउस’

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उत्तराखंड पर मानों किसी की नज़र लगी हो। पलायन की चोट उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों पर सबसे ज्यादा लगी है। इसी के चलते घर के घर खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। लेकिन कुछ युवाओं की सोच ने इन्हीं खंडहरों में जान फूंकने का काम किया है। खूबसूरत वादियों के बीच इन्हीं खंडहरों को दुबारा ज़िंदा करने का काम किया है अभय शर्मा और यश भंडारी ने। टिहरी गढ़वाल के चोपडियाल गांव में हिम्मत सिंह पुंडीर का ये भवन 2014 से पहले खंडहर हो चुका था। लेकिन अभय और यश की जोड़ी ने इस पर्वतीय शैली से बने घर को पहले लीज पर लिया और करीब एक साल की मेहनत के बाद इसे सैलानियों के लिए जन्नत बना दिया। इन युवाओं की मेहनत इस कदर रंग लाई कि अब ये वीरान और खंडहर हो चुका घर आलीशान इंटरनेश्नल टूरिस्ट स्पॉट की शक्ल ले चुका है। पहाड़ के युवाओं के इसी कारनामें ने पलायन का दंश झेल रहे क्षेत्रों में उम्मीद की एक नई किरण पैदा की है। इस होमस्टे का नाम पहाड़ी हाउस दिया गया है और ये मसूरी और धनोल्टी फ्रूट बेल्ट क्षेत्र में चंबा से मात्र सात किमी की दूरी पर चोपडियाल गांव में स्थित है।

ऐसे आया ‘पहाड़ी हाउस’ का आइडिया!

अभय शर्मा और यश भंडारी इससे पहले राफ्टिंग-कैंपिंग व्यवसाय से जड़े थे। लेकिन 2013 की आपदा ने पौड़ी के घट्टूघाट स्थित इनके 20 कॉटेज के रिजार्ट को तहस-नहस कर दिया। इसके बाद भी इन्होंने हार नहीं मानी और कुछ नया करने की ठानी। लिहाज़ा उन्होंने गांव का भ्रमण करना शुरु किया और वहां के पुराने-खंडहर हो चुके घरों का जीर्णोद्धार कर उसे एक होमस्टे देने का आइडिया आया। जो पहले ही प्रोजेक्ट पर हिट साबित हुआ। इसका नाम ‘पहाड़ी हाउस’ दिया गया। पहाड़ के पुराने घरों को होमस्टे का ये कॉन्सेप्ट देखते ही देखते हिट हो गया। दोनों युवाओं को इस ‘पहाड़ी हाउस’ में और बड़ा प्रोजेक्ट दिखने लगा और उन्होंने इस पर नए-नए प्रयोग शुरु कर दिए।

पहाड़ी हाउस क्यों है खास?

2015 में ये खंडहर रिवाइव होकर पहाड़ी हाउस बना। तब से लेकर अब तक यहां देश-विदेश के सैकडों सैलानी इस हाउस का आनंद ले चुके हैं। इस होमस्टे को पुराने तौर तरीकों से ईजाद किया गया है।पहाड़ी हाउस प्रोजेक्ट की खास बात ये थी कि इसमें पहाड़ी शैली में किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई। अब यहां आने वाले पर्यटकों की तादाद भी लगातार बढ़ रही है। यहां ठहरने वाले पर्यटकों को आसपास के गांवों में भ्रमण के अलावा रसोईघर में खुद अपनी पसंद का खाना बनाने की सुविधा भी दी जाती है। पहाड़ी हाउस के बगीचों में फूल और सब्जियां भी उगाई जाती हैं। जिनका प्रयोग यहीं की रसोई में किया जाता है।यहां आने वाले पर्यटकों को पूरी तरह से पहाड़ी व्यंजन परोसे जाते हैं। जिसमें गहत की दाल, झंगोरे की खीर, भट्ट का राबडू, कौदे की रोटी, चौंसा, चुटक्वाणी, काफली, झौली आदि शामिल हैं। यह सभी उत्पाद आसपास के ग्रामीणों से ही खरीदे जाते हैं। ऐसे में इनकी भी अच्छी आमदनी हो जाती है।इसमें जब भी कोई टूरिस्ट रुकने के लिए आता है तो सबसे पहले उसका स्वागत पारम्परिक वाद्य यंत्रों जैसे ढोल-दमऊ के साथ होता है। स्थानीय वाद्य यंत्रों से स्वागत के बाद सैलानियों को पटाल से बने घर में रात्रि विश्राम करते हैं। पहाड़ी हाउस के चारों तरफ सेब, पुलम, आडू, नाशपाती के पेड़ हैं और सामने हिमालय की हिमधवल चोटियां सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देती है। कुल मिलाकर पर्यटकों को कुछ आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ पहाड़ के ग्रामीण परिवेश से रूबरू कराया जाता है। पहाड़ी हाउस को हकीकत में बदलने वाले दोनों युवाओं की अनूठी पहल की पर्यटन मंत्री और मुख्यमंत्री भी कई मौकों पर प्रशंसा कर चुके हैं।

पैदा हुए रोजगार के अवसर

पहाड़ी हाऊस से कई स्थानीय लोगों को भी रोजगार के अवसर मिले है। पहाडी हाऊस की खासियत ये भी है कि सैलानियों को पहाड़ी भोजन परोसा जाता है। यहां काम करने वाले लोग गाइड की भूमिका भी निभाते हैं और सैलानियों के कहने पर वो उन्हें आस पास के ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण कराने जाते हैं। 2015 के बाद से यहां जर्मनी, फ्रांस, जापान, कनाडा और अमेरिका से आने वाले विदेशी सैलानियों की तादात बढ़ी है। जिसका अप्रत्यक्ष रूप से ही सही लेकिन गांव वालों को रोज़गार के तौर पर सीधा फायदा पहुंचा है। लिहाज़ा गांव में बना ये पहाड़ी हाउस लोगों के लिए रोज़गार के अवसर भी पैदा करने वाला कारक बन गया।

बदली पारंपरिक घरों की तस्वीर

उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में पर्वतीय शैली में बने भवन काफी मजबूत होते है। यही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी ये घर काफी फायदेमंद होते है। पुराने शैली पर बने मकानों की खास बात ये थी कि स्थानीय मिट्टी, पत्थर, लकड़ी और गोबर से तैयार किए गए ये पर्वतीय भवन गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्म होते है। इसके साथ ही भूकंप की दृष्टि से भी ये भवन मजबूत माने जाते हैं। उत्तराखंड में कई गांवों में बहुत ही सुन्दर आकृति से लकड़ी में नक्काशी घर बनाए गए हैं। बड़े-बड़े पटाल से छत तैयार की गई है। ऐसे में इन घरों को संवारकर अगर सैलानियों को आमंत्रित किया जाए, तो ग्रामीण पर्यटन रफ्तार पकड़ सकता है। अभय शर्मा कहते है कि

उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, पौड़ी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ में कई गांव ऐसे है जहां बहुत भव्य और सु्दर भवन खंडहर होते जा रहे है। अभय ने कहा कि उनका सपना है कि पहाड़ में 2 हजार से अधिक पहाड़ी हाऊस तैयार किए जाएं जिससे स्थानीय लोगों को पहाड़ में ही रोजगार मिल जाएगा।

ग्रामीण पर्यटन की बढ़ीं संभावनाएं

उत्तराखंड में कई गांव ऐसे है जो राज्य गठन के बाद खाली हो चुके हैं। उत्तराखंड पलायन आयोग ने कुछ वक्त पहले जो आकड़े जारी किए थे, उसमें 7 सालों में ही 700 गांव खाली होने का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में 10 सालों में लगभग 4 लाख लोगों ने पहाड़ से पलायन कर दिया। उत्तराखंड के 5 पहाड़ी जिलों पौड़ी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा में पलायन की स्थिति सबसे चिंताजनक है। यही नहीं भारत चीन बार्डर से जुड़े 14 गांव भी पूरी तरह वीरान हो चुके है, जो सामरिक दृष्टि से भी बेहद चिंताजनक है। लिहाज़ा इन दोनों युवाओं की पहल पर सरकार की मदद चाहिए ताकि इन गांवों में भी विलेज टूरिज़्म डेवलेप हो सके और पहाड़ी हाउस का दायरा भी बढ़ सके। 

आंकड़ों पर नजर रखें तो करीब 32 लाख लोग पहाड़ों से पलायन कर चुके हैं और करीब 3 लाख घरों पर ताले लटक चुके है। इन्हीं खंडहर घरों को अगर फिर से बना दिया जाए, तो पहाड़ों में कई घर जो वीरान हो चुके है फिर से आबाद हो जाएंगे। पहाड़ों से पलायन को रोकने के लिए राज्य सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन अभय शर्मा जैसे युवाओं ने साबित कर दिया है कि अगर नई सोच हो तो फिर खंडहर हो चुके घरों में भी नई जान फूंकी जा सकती है, जिन्होंने वीरान हो रहे पहाड़ों में नई उम्मीदें जताई हैं। 


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