उत्तराखंड के पहाड़ों में अब ट्रैक्टर से खेती होगी संभव, IIM में किसान के बेटे का अनोखा अविष्कार

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पहाड़ में चुनौतियां भी पहाड़ जैसी ही होती हैं। और अगर बात पहाड़ों पर खेती की हो तो फिर तो ये और भी मुश्किल काम बन जाता है। पहाड़ पर खेती करना बेहद मुश्किल काम हैं। यही वजह है कि पहाड़ के किसान बाकी किसानों से भले ही कम काम करते हों लेकिन उनका कम काम भी बाकी किसानों के कामों से कहीं ज्यादा आंका जाता है। क्योंकि जितनी मुश्किल खेत की जुताई में होती है तो सिंचाई की दिक्कत उससे भी चार गुनी होती है।

हालांकि मैदान के किसान तो खेतों में ट्रेक्टर का इस्तेमाल कर लेते हैं लेकिन पहाड़ के किसानों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत इसी की आती है कि वो पहाड़ के खेतों में ट्रेक्टर का इस्तेमाल नहीं कर पाते। लेकिन  इनहीं पहाड़ के किसानों की मुश्किल को कुछ हद तक आसान करने की कोशिश की है महाराष्ट्र के श्रीलेश माडेय ने। पहाड़ी खेतों की जुताई के लिए विशेष ट्रैक्टर डिजाइन किया है। नाम दिया है ट्रैक्ड्रील। आइआइएम के फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट में तीन माह के प्रशिक्षण के बाद श्रीलेश को यह सफलता मिली।किसान इस ट्रैक्टर को दो लाख रुपये में खरीद सकेंगे।

श्रीलेश के काम से प्रभावित होकर आइआइएम ने कृषि मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग को फंड जारी करने की संस्तुति की है। ऐसा हुआ तो पहाड़ के किसानों को बड़ी राहत मिलेगी। तब बाजार में पांच से छह लाख में मिलने वाले ट्रैक्टर के विकल्प के तौर मात्र दो लाख में ही किसान इस ट्रैक्टर इस्तेमाल कर सकेंगे। ट्रैकड्रील को पहाड़ की खेती के अनुसार डिजाइन किया गया है। इससे वह ऊंची चढ़ाई आसानी से पार करने में सक्षम है। खास बात है कि कम जगह में मुड़ भी जाएगा। इससे किसान जुताई और फॉगिंग भी आसानी से कर सकेंगे। 

महाराष्ट्र के पुणे जिले के ओजर गांव निवासी श्रीलेश माडेय किसान परिवार से ही ताल्लुक रखते हैं। माडेय खेती को सुगम बनाने के लिए ट्रैक्टर खरीदना चाहते थे, लेकिन आर्थिक स्थिति से मजबूर रहे। गन्ने की खेती के लिए पॉवर ट्रिलर खरीदा, जिसे चलाना आसान नहीं था। और यहीं से ट्रैक्ड्रील ट्रैक्टर की सोच शुरू हुई। हालांकि ये आसान जरा भी नहीं था। इसके लिए श्रीलेश हाई स्कूल के बाद से ही अपने इस मिशन को पूरा करने में जुट गए। सालष 2013 में मैकेनिकल डिप्लोमा के दौरान माडेय ने पहला मॉडल बनाकार दिखाया । इस बीच शिवनगर इंजनियरिंग कॉलेज से  मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। यहां ट्रैक्ड्रील के मॉडल को नया रूप मिला। 

आइआइएम के टॉप थ्री स्टार्टअप में  श्रीलेश के सपनों को पंख देने का काम विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने किया। स्टार्टअप के तहत आइआइएम काशीपुर फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट के तहत तीन माह का प्रशिक्षण भी दिया गया। मॉडल की प्रस्तुति के लिए मंत्रालय ने 10 लाख रुपये का बजट दिया। इसके बाद 25 लाख की अतिरिक्त मंजूरी के लिए कृषि मंत्रालय को भी प्रोजेक्ट भेजा गया। वहां पेटेंट कराने की प्रक्रिया अंतिम दौर में है। 

श्रीलेश ने बताया कि ट्रैक्ड्रील से खेती की लागत काफी कम होगी। यह जुताई, बुआई, स्प्रेयर, रोटावेटर के साथ- साथ  खरपतवार निकालने तक का काम करेगा। वहीं आइआअइएम डायरेक्टर फीड सफल बत्र ने बताया कि आइआइएम काशीपुर फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट के तहत बेस्ट स्टार्टअप के तौर पर श्रीलेश का चयन किया गया था। उन्हें तीन महीने का प्रशिक्षण भी दिया गया। उनका प्रयोग किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। ज़ाहिर है पहाड़ के किसानों के लिए श्रीलेश का ये प्रयोग काफी सफल होगा और अगर ये वाकई कारगर साबित हुआ तो पहाड़ में खेती करना काफी आसान हो जाएगा।


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