1.5 लाख रुपये किलो में बिकने वाली बेशकीमती केसर को रंजना ने उत्तराखंड में उगा दिया, जानिए कैसे

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देहरादून: वक्त बदल रहा है। युवा खुद को स्थापित करने के लिए कुछ अलग करने की कोशिश करने लगा है। भले ही देश में रोजगार ना मिलने का रोना हो लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो रोने से ज्यादा कर्म पर भरोसा रखता है। उसे उनके अलावा क्षेत्र को भी पहचान मिल रही है। वह अपने अलावा अन्य लोगों को भी रोजगार दे रहे हैं। उत्तराखण्ड में कृषि विज्ञान के क्षेत्र में कई स्टार्टअप सामने आए हैं। प्रकृति से छेड़छाड़ किए बिना रोजगार के मौके युवा तलाश कर रहे हैं। आज हम आपको उत्तराखंड की रंजना रावत के बारे में बताने जा रहे हैं। इस क्षेत्र में काम करने के लिए रंजना रावत ने मल्टीनेशनल कंपनी में क्वॉलिटी ऑफिसर की जॉब छोड़ दी और अपनी लगन और मेहनत के बूते ग्वालन से कृषि वैज्ञानिक बन गईं।

मिठाई की मिठास लोगों को भा गई

रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड) के गांव भीरी की रहने वाली डीएस रावत की बेटी रंजना रावत दिल्ली स्थित मल्टीनैशनल कंपनी में क्वॉलिटी ऑफिसर की जॉब करती थी। एक बार उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम सुना और प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़कर स्वरोजगार के मार्ग पर चलने का फैसला किया। उस फैसले पर आज पूरे क्षेत्र को नाज हैं और रंजना रुद्रप्रयाग जिले में बागवानी, कृषि, मशरूम उत्पादन और फल संरक्षण के नाम से पहचानी जानी लगी हैं। मात्र 26 साल में रंजना ने अपने काम से सैकड़ों युवाओं को प्रेरित किया है। लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए वह उन्हें रोजगार के अलावा मशरूम उत्पादन की ट्रेनिंग भी देती हैं। पिछले साल होली के दौरान उनके द्वारा निर्मित पहाड़ी पोषक तत्वों बनी स्पेशल मिठाइयां कोदर्फ़ी (मंड़ुआ की बर्फी) और मंडुआ सिंगोरी ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। इसके बाद लोगों ने इन मिठाइयों का ऑर्डर देना शुरू कर दिया था।

अमेरिकन सैफ्रॉन की खेती

रंजना के लिए शुरुआत करना बिल्कुल भी आसान नहीं था। सबसे पहले रंजना ने प्रयोग के तौर पर अपने गाँव भीरी, रूद्रप्रयाग जनपद और टिहरी जनपद के प्रतापनगर में अमेरिकन सैफ्रॉन को पैदा किया।उनका लक्ष्य राज्य के किसानों के साथ काम करना था। काम अच्छी दिशा में जाने लगा तो उन्होंने राज्य के अधिकतर किसानों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर इसकी व्यापारिक खेती करने का का प्लान बनाया। बता दें कि यदि टेस्टिंग में अमेरिकन सैफ्रॉन का पैंतालीस प्रतिशत भी अर्क निकला तो उसका भाव 70 हजार रुपये से 1.5 लाख रूपये प्रति किलो तक हो सकता है। इसे अमेरिकन केसर के नाम से भी जाना जाता है और वानस्पतिक नाम कारथेमस टिंकटोरियस है। भारत में राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में भी कई जागरूक किसान अमेरिकन सैफ्रॉन की खेती कर लाखों रुपए की आय कर रहे हैं।

क्या है अमेरिकन सैफ्रॉन

अमेरिकन सैफ्रॉन एक बहुमूल्य हर्ब है। बाजार में इसका मूल्य चालीस हजार से लेकर एक लाख रुपये प्रति किलो है। इसके पचास ग्राम बीज को एक बीघा जमीन पर रोपा जाता है। एक बीज चालीस रुपए के आसपास मिलता है। यह फसल अक्टूबर में लगाई गयी जाती है। फसल पांच से छह महीने में तैयार हो जाती है जिससे करीब दस किलो केसर का पैदा हो सकता है। अन्य फसलों की तुलना में इसकी खेती करना आसान है। ड्रिप पद्धति से इसकी फसल तैयार होती है। पौधों में कोई बीमारी नहीं लगती है। जैविक फसल का पौधा 4.5 फुट लंबा होता है। जिस पर दो सौ से ढाई सौ तक फूल लगते हैं जिनकी पंखुड़ियों से केसर मिलती है।

फूलों को सुखाकर उससे केसर निकाल कर कंटेनर में रख दिया जाता है। जब पूरी फसल कट जाती है, उसके बाद इसे छाया में अच्छे से सुखा कर बाजार में बेचा जाता है। सैफ्रॉन विश्व के विभिन्न भू-भागों में पाया जाता है। रंजना रावत के अलावा देवभूमि की तमाम युवा प्रतिभाएं कृषि विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, जैव रसायन एवं सूक्ष्म जैविकीय वनस्पति विज्ञान, रसायन विज्ञान, पृथ्वी विज्ञान सह भू-विज्ञान, भू-भौतिकीय अभियान्त्रिकी विज्ञान एवं तकनीकी, पर्यावरण विज्ञान एवं वानिकी, गृह विज्ञान पदार्थ एवं सूक्ष्मकण विज्ञान गणित, सांख्यकी आदि विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत कर देश-दुनिया अपने को स्थापित कर चुकी है। इस लिस्ट में दिव्या रावत, श्वेता तोमर, हरिओम नौटियाल नाम शामिल हैं। आदि ऐसे ही प्रेरक नाम हैं। इनकी मुहिम रंग भी ला रही है। वह इन दिनों उत्तराखंड के पहाड़ों में रोजगार तथा कृषि को बढ़ावा दे रही हैं। रंजना रावत स्वरोजगार के जरिए पहाड़ों से पलायन रोकने, ग्रामीण विकास की परिकल्पना को चरितार्थ करने और रोजगार सृजन की मुहिम चला रही हैं। फार्मेसी विशेषज्ञ रंजना के खेतों में बेशकीमती अमेरिकन सेफ्रान की खुशबू बिखेर रही है। अमेरिकन केसर की खेती पहाड़ में उपयोगी साबित हो सकती है। क्योंकि इसे जंगली जानवरों से कम खतरा है। सरकार स्तर पर प्रयास हुए तो इसकी खेती पलायन रोकने और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


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