नदियों में प्रवाहित होने वाली चुन्नियों से शुरू किया स्टार्ट-अप, आज बन गई रोल मॉडल

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अपने बारे में हर कोई सोचता है। बचपन से पढ़ाई और फिर नौकरी अपनी जिंदगी के लिए होती है,ये धारणा सदियों से है। वक्त बदल रहा है तो भारत भी बदल रहा है। आज हम आपकों उत्तराखंड की रहने वाली एक ऐसी बेटी के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने इंसानियत के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी। वो पीढ़ी के लिए कुछ अलग करना चाहती थी तो उसने सफाई को लेकर काम शुरू किया। हम बात कर रहे हैं

मंदिर से शुरू हुआ स्टार्टअप

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में देवांचल विहार की रहने वाली संगीता थपलियाल के स्टार्टअप की कहानी थोड़ी अलग है जो कही और से नहीं मंदिरों से शुरू हुई है। मंदिरों में हम भेंट तो चढ़ाते हैं लेकिन उसके पैकेट के बारे में नहीं सोचते हैं। वह सभी नदियों में जाता है और पानी को दूषित करता है। संगीता को पर्यावरण से प्यार है और उसमें हो रहे नुकसान के बारे में काफी सोचा करती थीं। प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह संगीता सिंगल यूज प्लास्टिक मानती हैं। प्रदूषण के खिलाफ मुहिम शुरू करने के लिए संगीता ने नौकरी छोड़ दी।

गरीबों की मदद

वह कहती हैं कि देवी-देवताओं पर चढ़ाई जाने वाली चुनरियां नदियों में जाती है और प्राकृतिक जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। इन इस्तेमात दोबारा कभी नहीं होता है। इसमें सिंथेटिक की चुनरियां भी शामिल जो सिंगल यूज प्लाटिस्क के अंदर ही आता है। संगीता की सोच थी कि यदि मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा सूती चुनरियां चढ़ाई जाएं तो मंदिर में इस्तेमाल होने के बाद रद्दी होने के बाद उनका दोबारा उपयोग के लायक कपड़े तैयार करने में हो सकता है। इन कपड़ों का निर्धनों को कम दामों में दिया जा सकता है।

छोड़ दी नौकरी

संगीता अपना काम शुरू करने से पहले बाल एवं महिला विकास के वन स्टॉप सेंटर में केस वर्कर के रूप में नौकरी करती थी। चुनरियों की बर्बादी की ओर उनका ध्यान गया तो उन्होंने सबसे पहले अपनी नौकरी छोड़ी और नदियों में बहने वाली चुनरियों को इकट्ठा कर उनसे कपड़े तैयार करने का स्टार्टअप शुरू किया। इसके बाद पहाड़ की बेटी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और उनकी ये मुहिम पूरे राज्य में वायरल हो गई। जो सोच मंदिर से शुरू हो उसे भगवान का आशीर्वाद तो मिलना ही था। संगीता ने अपने साथ कई महिलाओं को जोड़ा और रोजगार भी दिया।

कुछ अलग करने की ललक

अपनी यात्रा के बारे में संगीता ने बताया कि जब वह वन स्टॉप सेंटर में नौकरी कर रही थीं, वहां आपराधिक घटनाओं से पीड़ित महिलाओं को ठिकाना देकर उनको कानूनी, मेडिकल, शैक्षिक, परामर्श और सुविधाएं दी जाती थीं, लेकिन जिंदगी नए सिरे से शुरू करने के लिए उन्हें रोजगार नहीं दिया जाता था। ये आईडिया तभी उनके दिमाख में आया।

आज हम कर रहे हैं कल कोई और करेगा

इस सोच के बारे में उन्होंने अपने पति विजय थपलियाल को बताया जो निरंजपुर कृषि मंडी समिति में सचिव हैं। इसके बाद संगीता ने ऋषिकेश गंगा सेवा समिति, केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिरों के समिति-प्रमुखों से संपर्क किया। समिति-प्रमुख को संगीता का मिशन पसंद आया। उन्होंने भी माना कि यदि बड़े धर्मस्थलों से यह अभियान शुरू होगा तो पर्यावरण बचेगा और रोजगार के कई मौके खुलेंगे। इसके बाद संगीता ने अपना काम शुरू कर दिया। वह सीधे से मंदिरों में चढ़ाई जाने वाली चुनरियां अपने यहां जुटाकर उनसे बच्चों के लिए सस्ते दाम के कपड़े तैयार करवाती है। वह कहती हैं कि ये काम बहुत बड़ा नहीं हैं, लेकिन इस देश का नागरिक होने के नाते बेरोजगारी, जलवायु आपदा और बिगड़ते पर्यावरण से निपटने के लिए इको फ्रेंडली अभियान का धरातल में लाना जरूरी है ताकि हम आने वाली पीढ़ी को बेहतर वातावरण दें। आज हम कर रहें हैं और कल को यही काम आधुनिकता के साथ कोई और करेंगा।


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