उत्तराखंड में ट्राउट मछली के स्टार्टअप से एक ही सीजन में 50 लाख रुपए की कमाई

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हल्द्वानी: पिछले कुछ वक्त से उत्तराखण्ड स्टार्टअप के वजह से सुर्खियों में है। राज्य के लोग स्टार्टअप के माध्यम से पलायन पर वार कर रहे हैं। इन सभी चीजों की ओर युवाओं का झुकाव तेजी से बढ़ रहा है। उम्मीद यही है कि आने वाले वर्षों में खाली पड़े गांव भरेंगे और रोजगार के अवसर पैदा होंगे। आज हम आपकों उत्तरकाशी के गांव बार्सू के कपिल रावत के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने सबसे मंहगी बिकने वाली ट्राउट मछली का स्टार्टअप शुरू किया है। कपिल रावत यह काम करने से पहले नौकरी करते थे। उन्हें अपना कुछ करने की चाहत थी। मछली पालन के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी। नौकरी के दौरान वह ट्राउट फार्मिंग के बारे में जानकारी प्राप्त करने लग गए। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान इस स्टार्टअप में लगाने का फैसला किया और नौकरी छोड़ दी।

कपिल ने नहीं मानी हार

कपिल रावत ने सबसे पहले ट्राउट प्रजाति की मछलियां पालना शुरू किया। उन्होंने इसके लिए 15 मीटर लम्बे, एक मीटर चौड़े और एक मीटर गहरे टैंक बनवाए, लेकिन यह सफल नहीं हुआ क्योंकि उनके पास जानकारी की कमी थी। कपिल के पास पीछे मुड़ने का कोई विकल्प नहीं था तो वह इसी में लग गए। हार से उठकर कपिल रावत ने पुराने टैंकों को दोबारा से बनवाया, जो ऊपर-नीचे रखे गए, ताकि एक टैंक से पानी होता हुआ दूसरे टैंक में पहुंच जाए। उसके बाद उन टैंकों में ट्राउट मछली के बीज डाले गए। कहते हैं ना मेहनत करते रहे हो नतीजा मिलता जरूर है। कपिल के साथ भी ऐसा ही हुआ। लगातार इस फील्ड में काम करने से मछली विभाग की ओर से उन्हें करीब ढाई लाख रुपये का अनुदान मिला। इसके बाद कपिल ने पीछे मुंड़कर नहीं देखा और अब कपिल के टैंकों में चार हजार से अधिक ट्राउट मछलियां पल रही हैं। जबकि ये संख्या जल्द एक टन होनों की उन्हें उम्मीद है।

काफी महंगी हैं ये मछलियां

बता दें कि इस समय ट्राउट मछली की कीमत बाजार में डेढ़ हजार रुपए प्रति किलो है। उस हिसाब से कपिल पहले ही सीजन में लगभग 60 लाख रुपए की मछलियां बेचने वाले हैं। कपिल के इस स्टार्टअप ने गांव के लोगों को भी रोजगार दिया है। गांव के ही किसान परमेंद्र सिंह ने तीन तालाबों में इस बार मात्र 50 किलो ट्राउट बेचकर 75 हजार रुपए की कमाई की है।

अपनी योजनाओं के बारे में कपिल रावत कहते हैं कि पहाड़ों में रोजगार देने के लिए वह आगे वह ट्राउट मछली पालन का एक बड़ा प्रोजेक्ट लगाने जा रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत वह ट्राउट मछलियों के बीज भी अपने यहां ही तैयार कराने वाले हैं। इससे ट्राउट के बीजों का एक और कारोबार खड़ा हो जाएगा।

उत्तराखण्ड में इन मछलियों का इतिहास

बता दें कि उत्तराखंड में ट्राउट मछली मुख्य रूप से उत्तरकाशी के डोडीताल में पाई जाती है। कहा जाता है कि साल 1910 में टिहरी रियासत के समय राजदरबार के अंग्रेज मित्र नार्वे के नेल्सन ने डोडीताल में ट्राउट मछली के बीज डाले थे। इसके बाद से डोडीताल में एंगलिंग के लिए देश-विदेश के सैलानी यहां पहुंचते हैं। वैसे ट्राउट मछलियों का बाजार पश्चिमी राष्ट्रों में भी है। इस लिस्ट में यूरोप, अमेरिका की ठंडी नदियां शामिल हैं जहां ट्राउट मछलियां पाई जाती हैं। डिब्बा बंद मीट में भी इसका बड़ा बाजार है। स्वाद और पौष्टिकता के वजह से ट्राउट सबसे अलग है। इसी वजह से फाइव स्टार होटलों में इनकी लगातार बड़ी डिमांड रहती है।

सेहत के लिए है लाभकारी

ट्राउट दिल के मरीजों के लिए रामबाण का काम करती है।  हिमाचल प्रदेश में यह काम काफी फलफूल रहा है। राज्य से प्रति वर्ष 150 टन से अधिक ट्राउट देश के बाहरी राज्यों में निर्यात होती है। इसकी सबसे ज्यादा मांग दिल्ली और पंजाब में है। हिमाचल प्रदेश में ट्राउट मत्स्य पालन पिछले सौ वर्षों से किया जा रहा है। नाबार्ड के अनुसार केवल 2.30 लाख रुपए में ट्राउट फार्मिंग शुरू की जा सकती है, ऐसे में अगर आपको 20 फीसदी सब्सिडी मिल जाती है तो आपको मात्र 1.8 लाख रुपए का इन्‍वेस्‍टमेंट करना होगा।

हिमाचल प्रदेश में ही इसका सबसे अधिक उत्‍पादन होता है। यहां ब्राउन और रेनबो कलर की ट्राउट मिलती हैं। राज्य सरकार द्वारा यहां ट्राउट फार्मिंग के लिए विशेष मदद दी जाती है। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए 1 सरकार के वक़्त मत्स्य पालन के लिए अलग से मंत्रालय बना दिया थे ताकि मछली पालन करने वाले किसानों को फायदा पहुंचे। पहाड़ी इलाकों में इसके परिणाम दिखने लगे हैं


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