आनंद के जुनून ने बदली उत्तराखण्ड के 37 गांवों की तस्वीर, लोगों को मिली नई ज़िंदगी

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उत्तराखण्ड भले ही आगें बढ़ रहा हो लेकिन राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में मेडिकल सुविधा किसी बुरे सपने से कम नहीं है। हमें खुद ये लिखने में अच्छा नहीं लग रहा है कि हमारा राज्य जो 19 साल का हो चुका है वहां इलाज ना मिलने के चलते सैकड़ो लोगों की मौत होती है। इनमें सबसे अधिक गर्भवती महिलाएं हैं। पलायन को कोसा जाता है लेकिन यह सुविधाओं के ना होने की तो देन हैं वरना किसे अपना घर छोड़ना अच्छा लगता है। आज हम आपकों एक ऐसे शख्स की कहानी बता रहे हैं , जिनके बारे में काफी कम लोगों को पता होगा लेकिन उनका काम किसी देवता से कम नहीं है।

राज्य के गढ़वाल मंडल में स्थित टंस वैली अपनी खूबसूरती के लिए विख्यात है। इस क्षेत्र में करीब 37 गांव है, जहां की आबादी 22 हजार के आसपास होगी। यहां 70 प्रतिशत से ज्यादा गांव का मुख्य मार्ग से कोई संपर्क नहीं है। इंटरनेट सुविधा भी भगवान भरोसे हैं। स्थानीय लोगों को गांव से बाहर जाना है तो उन्हें 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। अगर मेडिकल सुविधा चाहिए तो उत्तरकाशी का रुख करना पड़ेगा जो कि 170 किलोमीटर दूर और राजधानी देहरादून में सुविधा चाहिए तो 200 किलोमीटर का सफर तय करना होता है। बरसात के मौसम में तो हालात और भी बदतर हो जाते हैं। 37 गांवों का एक दूसरे से संपर्क पूरी तरह से टूट जाता है क्योंकि गांव में एक भी पुल नहीं है। वैली में 12% लोग टीबी से ग्रस्त है तो वहीं 80 प्रतिशत नवजात का जन्म टॉइलेट या फिर खुले में बिना किसी साहयक के होता है।

आप सोचकर देखिए क्या स्मार्ट इंडिया, स्मार्ट उत्तराखण्ड का सपना ऐसे पूरा होगा…जरूर पूरा होगा, अगर देश की युवा पीढ़ी इस दर्द को समझे तो पहाड़ी क्षेत्रों में भी हम वही जीवन जी सकेंगे जिसके लिए हम शहरों की तरफ दौड़ते हैं। टंस वैली में कलाप ट्रस्ट नाम का एनजीओ क्षेत्र में मेडिकल सुविधाएं दे रहा है। जो काम एक सरकार को करना चाहिए वह एक युवा की सोच कर रही है।

ग्रामीण लोगों के मुख्य और कम रुपए में इलाज देने के लिए लक्ष्य के साथ कलाप ट्रस्ट नाम का एनजीओ आनन्द शंकर ने खोला। शंकर पिछले साल अक्टूबर में वैली का पहला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खोला। कलाप ट्रस्ट साल 2014 में पंजीकृत हुआ था। शंकर ने अपनी वीडियो पत्रकारिता की पढ़ाई छोड़कर गांव में रह रहे लोगों की जिंदगी बेहतर इलाज और शिक्षा के माध्यम से सुधारने का फैसला किया।

अपनी यात्रा के बारे में आनन्द शंकर बताते हैं कि टंस वैली के हालात देखकर ऐसा लगा मानों इसका भारत से कोई संबंध नहीं है। यहां के लोग पैसों के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। यहां काम के बदले काम और सेवा जैसी प्रथा जो सालों पुरानी है वह अपनाई जाती है। ग्रामीणों का दुनिया से कोई संबंध नहीं थी, इस वजह से उनके पास कोई जानकारी भी नहीं थी। भले ही वह हेल्थ हो या फिर शिक्षा। आनन्द ने क्राउडसोर्सिंग के जरिए 20 लाख रुपए का फंड जमा किया।

इस हालात से निकलने के लिए कलाप ट्रस्ट ने कोटगांव गांव में एक पुरानी इमारत को सही कर वहां पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र निर्माण कराया, जहां मेडिकल सुविधा के लिए जरूरी वस्तुएं खरीदी गई। मेडिकल सुविधा को सुचारू करने के लिए आनन्द ने दो डॉक्टर्स और नर्स की नियुक्ति की जो रोजाना 20-30 मरीजों को देखते हैं। अच्छा काम करने वालों के लिए रास्ते खुलते रहते हैं, ऐसा ही आनन्द के साथ हुआ। स्टाफ का वेतन अक्टूबर 2018 से जुलाई 2019 तक टाटा ट्रस्ट द्वारा दिए जाने लगा। मेडिकल सुविधाओं को और बेहतर करने के लिए आनन्द फंड की तालाशने की कोशिश कर रहे हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में लगभग वह सारी सुविधाएं मौजूद हैं जो एक सरकारी हॉस्पिटल में होती है। इस लिस्ट में ऑक्सिजन,nebulisation, ब्लड टेस्ट किट, ईसीजी टेस्ट, ट्रामा व यूरिन टेस्ट शामिल है।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पहली बार पंजीकरण के लिए मरीजों को 25 रुपए देने होते हैं, जो बाद में 20 रुपए हो जाता है। केंद्र द्वारा एक नंबर दिया जाता है और उस नंबर के जरिए मरीजों का रिकॉर्ड रखा जाता है। 14 साल तक के बच्चे और गर्भवती महिलाओं के लिए इलाज मुफ्त है। कल्प ने दवाओं के लिए स्थानीय फॉर्मेसी से टाइअप किया हुआ है ताकि खराब दवाओं के सेवन से लोगों को बचाया जा सके।

आनन्द बताते हैं कि विशेषज्ञ के ना होने से गलत दवाएं खाने से लोगों की मौत भी हुई है। इलाज हर दिन बेहतरी की ओर बढ़े इसके लिए आनन्द द्वारा सीनियर मेडिकल विशेषज्ञों को कैंप में बुलाया जाता है। सड़क ना होने के वजह से लोगों को घर-घर जाकर हफ्ते में इलाज दिया जाता है। अपनी टीम को बढ़ाने के लिए आनन्द से ग्रामीणों और एनजीओं से जुड़े लोगों को हिमालयन इंस्टीट्यूट हॉस्पिटल ट्रस्ट में ट्रेनिंग दी जाती है।

इस तरह से अब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के पास 8 लोगों की टीम हो गई है, जिन्हें 5000 रुपए प्रति माह वेतन मिलता है। मेडिकल सुविधाओं के मिलने से लोगों हेल्थ के बारे में सोचने लगे हैं और उत्साह से जानकारी हासिल करते हैं। इसके गांव में जानवरों के हमला भी होते रहते हैं और घायल लोगों का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज होता है।

कौन है आनन्द शंकर

आनन्द शंकर पेशे से एक वीडियो जर्नलिस्ट थे। साल 2007 में वह पहली बार टंस वैली ( कलाप गांव) में पहुंचे थे। शंकर को पहाड़ी इलाको में काम करने का मन पहले से था। वह बताते हैं कि मैं इस तरह की बातें ऑफिस में किया करता था। साल 2010 में उन्हें पत्रकारिता छोड़ दी औ टूर एंड ट्रेवल के क्षेत्र में व्यापार करने के लिए बेंगलूरू चले गए। व्यापार चला नहीं रहा था और साल 2013 में शंकर एक बार फिर कलाप गांव पहुंचे और उसकी खूबसूरती ने उन्हें अपना दीवाना बना दिया। 35 वर्षीय शंकर कहते है कि गांव में कोई संसाधान नहीं था और यह मुझे रोज भयभीत करता था। एक बार 70 साल की दादी आनन्द के पैर केवल इसलिए छूने लगी क्योंकि उन्हें बुखार की दवाई दी थी। इस क्षण ने आनन्द शंकर को झकझोर कर रख दिया और फिर उन्होंने अपना पूरा जीवन इंसानियत के हवाले कर दिया। कलाप ट्रस्ट स्थानीय निवासियों को कई योजनाओं की जानकारी भी देता है। आनन्द का मकसद है कि इलाके में कोई इंसान इलाज के चलते अपनी जान ना खोए। उसके लिए वह फंड की तलाश में जुटे हुए हैं ताकि सुविधाओं को बढाया जा सकें। उन्होंने लोगों से इस मुहीम का हिस्सा बनने व सहयोग देने का आग्रह किया है। उत्तराखंड में ऐसे ही लोग अगर इंसानियत के रास्ते पर आगे चलेंगे तो यकीनन सुविधाओं के आभाव में किसी को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ेगी। आनंद शंकर की इस शानदार पहल को हमारा सलाम।


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