रंग लाई हर्षित की मेहनत, विदेशों में छा गया उत्तराखंड का “नूण”

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हल्द्वानी: राज्य को देवभूमि कहते हैं क्योंकि यहां देवो का वास है। जहां भगवान होंगे वहां प्राकृतिक चीजों की कमी नहीं होगी। मैदानी इलाकों में इनका मोल भले ही कम हो लेकिन पहाड़ों में नहीं। उत्तराखंड के रहने वाले लोग अक्सर अपने बच्चों को कहते हैं कि तुम क्या जानों मेहनत हम लोग रोटी नमक के साथ खाते थे, बच्चों को लगता है कि परिजन यह गरीबी को लेकर बोल रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं हैं। वो नमक होता था हाथ बना हुआ ( सिलबट्टे ) जो हर बार कुछ नया स्वाद देता है। खाना बनाने से बचने के लिए पहाड़ में रहने वाले लोग इसका प्रयोग खाने में करते थे। वक्त बदला लेकिन नमक का स्वाद और तगड़ा हो गया। पहाड़ के नमक की अब विदेशों में मांग है। कई युवा इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

देहरादून के हर्षित सहदेव की स्टोरी कुछ वक्त पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। उन्होंने जानकारी दी थी कि ब्लड प्रेशर रोधी पहाड़ी नमक हिमशक्ति को वह विदेशों में भेजते हैं। इस बारें वह ऑनलाइन भी लिखते थे ताकि लोगों को जानकारी मिले। उनके लेख को अपना कमाल करना ही था। फ्रांस से क्लोय एंडो नाम की युवती को इस बारे में पता चला। वह देहरादून पहुंची और दिदसारी का दस हजार रुपये का सैंपल खरीद कर ले गई। फ्रांस पहुंचकर पहाड़ के नमक का स्वाद छा गया। एक कॉरपोरेट हाउस को यह गुणकारी उत्पाद पसंद आ गया।

हर्षित के लिए यह प्लेटफॉर्म किसी सपने की तरह था। उन्होंने मौके का फायदा उठाया। देहरादून में हिमशक्ति नाम से अपनी स्टार्टअप कंपनी लांच कर वेबसाइट पर नमक का प्रचार किया। सबसे अच्छी बात कि उन्होंने स्थानीय लोगों को अपने साथ जोड़ा। पहाड़ का नाम महिलाओं को रोजी देने का काम करने लगा था। उत्तराखंड से पैकेट तैयार कर फ्रांस भेजे जाते थे। धीरे-धीरे यह नमक अन्य देशों में विख्यात होने लगा है। हर्षित का कहना है कि नमक बनाना एक कला है। यह पहाड़ के लोगों के रोजगार दे रहा है। जितना ज्यादा रोजगार होगा उतने अलग प्रकार के नमक मार्केट में आ पाएंगे।


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